नयी दिल्ली , दिसम्बर 10 -- कोठे से शुरू हुई तवायफ़ों की गायिकी की 33 भूली बिसरी शख्सियतों को यहां एक नृत्य नाटिका के जरिये याद किया गया जिनमें गौहर जान से असगरी बाई तक शामिल हैं ।
इस नृत्य नाटिका में तवायफ गायिकाओं का दर्द, संघर्ष, बुलंदी, शोहरत, गुरबत, देशभक्ति ,समाज सेवा और मानवता तथा करुणा को दिखाया गया।
इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के सी डी देशमुख हाल में मंगलवार शाम आयोजित इस समारोह में चर्चित नृत्यांगना सोमा बनर्जी के नेतृत्व में 30 से अधिक कलाकारों ने इन गायिकाओं की ऐतिहासिक यात्रा को मंच पर पेश किया। वर्ष 1902 में गौहर जान की पहली ग्रामोफोन रिकार्डिंग से लेकर जानकी बाई बिब्बो रसूलन बाई, तमंचा जान रतन बाई छमिया बाई, दिलीपा बाई, विद्यधरी हुस्ना जान, ढेला बाई अख्तरी बाई को इस नृत्य नाटिका में दिखाया गया।
यह नृत्य नाटिका वरिष्ठ कवि एवम पत्रकार विमल कुमार की पुस्तक 'तवायफनामा' पर आधारित थी।
इस अवसर पर प्रख्यात कवि संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने संगीत में स्त्री सशक्तीकरण पर प्रथम रामेश्वरी नेहरू स्मृति व्याख्यान दिया।
श्री वाजपेयी ने रामेश्वरी नेहरू की 140वीं जयंती की पूर्व संध्या और प्रख्यात कवि पत्रकार रघुवीर सहाय की 96 वीं जयंती के मौके पर आयोजित इस समारोह में कहा कि संगीत की दुनिया में स्त्रियों को अपनी पहचान बनाने के लिए बड़ा सँघर्ष करना बड़ा क्योंकि उनपर तत्कालीन पितृसत्तात्मक समाज की बहुत बंदिशें थी । वे कोठे से लेकर रईसों राजे रजवाड़े के निजी महफिलों में गाती रहीं। पद्म भूषण रामेश्वरी नेहरू1942 के आंदोलन में जेल गयी थी और 1909 से प्रकाशित स्त्री दर्पण पत्रिका की संपादक थी।
श्री वाजपेयी ने प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक संगीत में स्त्रियों की भागीदारी का जिक्र करते हुए कहा कि ज्ञान की देवी माँ सरस्वती के हाथों में वीणा है। यह इस बात का प्रमाण है कि स्त्रियां आदिकाल से संगीत से जुड़ी हुई थीं लेकिन उनपर पुरुषों द्वारा कुछ बंदिशें भी लगी थीं पर उन्होंने उसे तोड़कर खुद को भी सशक्त किया और संगीत नृत्य में लालित्य सौंदर्य कोमलता को शामिल किया। कालांतर में उन्होंने पुरुष कलाकारों को पीछे छोड़ दिया तथा कथक में तो पुरुषों को अपदस्थ भी कर दिया। पहले तो पुरुष ही कथक करते थे जब स्त्रियाँ आईं तो यह उनक़ा ही नृत्य बन गया।
श्री वाजपेयी ने घर परिवार शादी व्याह और लोक अनुष्ठानों से लेकर फिल्मों में स्त्रियों की भागीदारी का जिक्र करते हुए कहा कि बीसवीं सदी में लता मंगेशकर से बड़ा कोई गायक नहीं हुआ। लता मंगेशकर तो सांस्कृतिक अस्मिता की प्रतीक बन गईं लेकिन स्त्रियों को इस मुकाम पर पहुंचने के लिए पुरुषों की तुलना में अधिक संघर्ष करना पड़ा।
स्त्री दर्पण ड्रीम फाउंडेशन और द परफोर्मिंग आर्ट ट्राइब्स द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस समारोह में बनारस घराने की गायिका मीनाक्षी प्रसाद ने कहा कि उन्नीसवीं सदी के मध्य में ये तवायफ़ गायिकाएं देश की सबसे बड़ी कर दाता थीं। इतना ही नहीं उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में भाग लिया और गांधी जी ने भी उनकी मदद ली थी।
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