विद्या शंकर रायलखनऊ , अप्रैल 11 -- भारत निर्वाचन आयोग ने उत्तर प्रदेश में 166 दिनों के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (एसआईआर) अभियान के बाद अंतिम मतदाता सूची जारी कर दी। इस सूची में दो करोड़ से ज़्यादा नाम डिलीट किये गए हैं। निर्वाचन आयोग की इस प्रक्रिया से न सिर्फ़ वोटरों की सूची में व्यापक बदलाव हुआ है, बल्कि इससे राजनीतिक पार्टियों को 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए अपनी रणनीति बदलने को मजबूर कर दिया है।
एसआईआर की प्रक्रिया पर भाजपा, सपा , बसपा और कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में कड़ी नज़र रखी। इन पार्टियों ने अपने कार्यकर्ताओं को न केवल वोटरों को शहरी इलाकों से गांवों की ओर न जाने के लिए मनाने के काम में लगाया, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि ड्राफ़्ट वोटर लिस्ट से नाम काटे जाने के बाद नए वोटरों के नाम भी दर्ज किए जाएं।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि यूपी में चलाई गई स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) की पूरी प्रक्रिया गैरकानूनी, लोकतंत्र के साथ धोखा और जनता के मताधिकार का सीधा हनन है। पार्टी वर्तमान मतदाता सूची को बिल्कुल स्वीकार नहीं करेगी।
उन्होंने मांग की कि चुनाव से पहले व्यापक जांच कर सभी 18 वर्ष पूरा कर चुके युवाओं के नाम मतदाता सूची में जोड़े जाएं।अगर केंद्रीय चुनाव आयोग यह काम करने में असमर्थ है तो नगर निकायों और ग्राम पंचायतों की मतदाता सूची को ही विधानसभा चुनाव के लिए इस्तेमाल किया जाए।
दरअसल, 27 अक्टूबर, 2025 से 10 अप्रैल के बीच, वोटर लिस्ट में न सिर्फ़ शहरी इलाकों जिनमें लखनऊ, गाज़ियाबाद, कानपुर नगर, गौतम बुद्ध नगर, मेरठ, आगरा और प्रयागराज शामिल हैं बल्कि ज़्यादा ग्रामीण आबादी वाले ज़िलों: कन्नौज, बलरामपुर, बदायूँ, बहराइच, फ़र्रुख़ाबाद, सोनभद्र और इटावा में भी वोटरों के नाम हटाए गए।
राज्य के शहरी इलाकों को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का गढ़ माना जाता है, और इन इलाकों ने 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में पार्टी की जीत में अहम भूमिका निभाई थी, जिससे विपक्षी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के जनाधार को नुकसान पहुँचा था।
2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में, BJP ने लखनऊ, गाज़ियाबाद, गौतम बुद्ध नगर, मेरठ और प्रयागराज में सबसे ज़्यादा सीटें जीती थीं।अब यह देखना बाकी है कि बड़ी संख्या में वोटरों के नाम हटाए जाने का असर पार्टी की चुनावी संभावनाओं पर पड़ता है या नहीं।
वहीं दूसरी ओर देखें तो ज़्यादा ग्रामीण आबादी वाले ज़िलों को समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाता है। PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फ़ॉर्मूले के सहारे, समाजवादी पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में अपनी सीटों की संख्या बढ़ाकर 37 कर ली, और जाति कार्ड खेलकर ज़्यादातर ग्रामीण सीटों पर जीत हासिल की। कन्नौज, इटावा, बदायूं, फर्रुखाबाद और बहराइच में बड़ी संख्या में वोटरों के नाम काटे जाने से SP खेमे में चिंता बढ़ने की संभावना है।
वहीं, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद राजीव राय ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि एस आई आर की प्रक्रिया पूरी तरह से भाजपा और निर्वाचन आयोग की मिलीभगत का नतीजा है। पार्टी अपनी रणनीति बनाने में जुटी है जल्द ही इसको लेकर ठोस कदम उठाया जाएगा।
दरअसल डुप्लीकेट, मृत और दूसरी जगह चले गए वोटरों के नाम काटे जाने, नए नाम जोड़े जाने, और बड़ी संख्या में वोटरों के शहरी इलाकों से गांवों की ओर पलायन करने से कई विधानसभा क्षेत्रों की आबादी के आंकड़ों में बदलाव आया है।
परंपरागत रूप से, BJP को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के ज़िलों - गाज़ियाबाद, गौतम बुद्ध नगर और मेरठ - में अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर बढ़त हासिल रही है।
इसके अलावा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बरेली और आगरा, मध्य यूपी के लखनऊ, और पूर्वी यूपी के प्रयागराज, वाराणसी और गोरखपुर में भी भाजपा का पलड़ा भारी रहा है। इन ज़िलों में सबसे ज़्यादा वोटरों के नाम हटाए गए हैं ।
रुहेलखंड क्षेत्र के ज़िलों रामपुर, सहारनपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, अमरोहा और पीलीभीत wasमें कुल मिलाकर 8% से 10% वोटरों के नाम हटाए गए हैं। इस क्षेत्र को समाजवादी पार्टी का मज़बूत गढ़ माना जाता है।
आजमगढ़ (9.46%), अंबेडकर नगर (9.90%), मैनपुरी (10.29%), जौनपुर (9.86%), एटा (11.20%), गाज़ीपुर (10.89%) और फ़िरोज़ाबाद (8.95%) में भी वोटरों के नाम हटाने की दर कम रही। इन ज़िलों में समाजवादी पार्टी ने 2022 में काफ़ी सीटें जीती थीं। 6 जनवरी को जारी की गई ड्राफ़्ट वोटर लिस्ट में 125.5 मिलियन वोटरों के नाम थे, जबकि 27 अक्टूबर, 2025 को जारी लिस्ट में 154.4 मिलियन वोटर थे।
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