रांची , दिसंबर 20 -- झारखंड में "सुरक्षित और सशक्त महिला" के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के संकल्प को जन-जन तक पहुंचाने और एक सशक्त झारखंड के निर्माण के उद्देश्य से रांची के शौर्य सभागार में अनुमंडल स्तरीय प्रशिक्षण सह कार्यशाला का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम का उद्घाटन समाज कल्याण निदेशालय की निदेशक किरण पासी ने किया। इस अवसर पर रांची के एसडीओ, डीडीसी, जिला शिक्षा अधीक्षक, सिविल सर्जन सहित समाज कल्याण विभाग से जुड़े पदाधिकारी, महिला सुपरवाइजर तथा बड़ी संख्या में आंगनबाड़ी सेविका-सहायिका उपस्थित रहीं। कार्यशाला में बाल विवाह, डायन-बिसाही, घरेलू हिंसा, सामाजिक कुरीतियों और महिला सशक्तिकरण में शिक्षा की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की गई।

जिला शिक्षा अधीक्षक बादल राज ने एनएफएचएस-5 के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि झारखंड में बाल विवाह की दर 32.2 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत 23.3 प्रतिशत से कहीं अधिक है। उन्होंने कहा कि बाल विवाह न केवल कानूनी अपराध है, बल्कि इसका सामाजिक, शारीरिक और मानसिक दुष्प्रभाव भी पड़ता है। इससे बालिकाओं की पढ़ाई छूट जाती है और राज्य व देश के विकास में उनकी संभावित भूमिका प्रभावित होती है। उन्होंने बताया कि कम उम्र में विवाह से घरेलू हिंसा और मातृत्व मृत्यु दर बढ़ने की आशंका रहती है। बीएनएस की धारा 375 बाल विवाह को निषिद्ध करती है, इसलिए इसे रोकने के लिए व्यापक जागरूकता जरूरी है, जिसमें विद्यालय अहम भूमिका निभा सकते हैं।

रांची के सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि कानून भले ही 18 वर्ष के बाद विवाह की अनुमति देता है, लेकिन समाज को यह समझाना होगा कि 21 वर्ष के बाद ही बेटी का विवाह किया जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि 18 वर्ष का मतलब पूर्ण 18 वर्ष होना है, उससे पहले विवाह करना अपराध है। डॉ. प्रभात कुमार ने डायन प्रथा को शर्मनाक बताते हुए कहा कि किसी महिला को डायन कहकर प्रताड़ित करना या उसकी हत्या करना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। उन्होंने बताया कि 6 से 11 जनवरी तक स्वास्थ्य विभाग द्वारा अंब्रेला कार्यक्रम के तहत विशेष स्क्रीनिंग अभियान चलाया जाएगा। साथ ही सावित्री बाई फुले किशोरी समृद्धि योजना की भी जानकारी दी गई।

मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित समाज कल्याण विभाग की निदेशक किरण पासी ने कहा कि झारखंड में कुपोषण की दर चिंताजनक है और करीब 65 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर प्रयासों, स्कूल ऑफ एक्सीलेंस और कस्तूरबा विद्यालयों के बावजूद बालिकाओं का ड्रॉपआउट प्रतिशत अधिक है। कोरोना के बाद किए गए एक सर्वे में 15 वर्ष तक की बालिकाओं का ड्रॉपआउट लगभग 40 प्रतिशत था, जो अब धीरे-धीरे कम हो रहा है।

श्रीमती पासी ने कहा कि राज्य में बाल विवाह की दर बेहद गंभीर विषय है, क्योंकि हर तीसरा विवाह बाल विवाह है। बाल विवाह के कारण कई प्रतिभाशाली बालिकाएं अपने सपनों को पूरा नहीं कर पातीं और कुपोषित मां से कुपोषित बच्चों का जन्म होता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि स्वर्णिम झारखंड और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को पाने के लिए महिलाओं का सशक्त होना अनिवार्य है।

श्रीमती पासी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कोई महिला डायन नहीं हो सकती, जो जीवन को जन्म देती है, उसे डायन कहकर प्रताड़ित करना घोर अपराध है। उन्होंने महिलाओं को महिला हेल्पलाइन नंबर 181, चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 और इमरजेंसी रिस्पॉन्स नंबर 112 की जानकारी देते हुए अपील की कि किसी भी तरह की परेशानी में इन नंबरों पर संपर्क कर सहायता लें।

कार्यशाला में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि सामाजिक कुरीतियों को जड़ से खत्म करने के लिए समाज के हर वर्ग को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी, तभी सुरक्षित और सशक्त झारखंड का सपना साकार हो सकेगा।

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