रांची , मई 05 -- झारखंड के भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भा.कृ.अनु.प.)-भारतीय कृषि जैवप्रौद्योगिकी संस्थान, राँची ने "मेरा गांव मेरा गौरव कार्यक्रम 2026" के अंतर्गत आज एक जागरूकता अभियान संचालित किया है और इसका उद्देश्य वैज्ञानिक आधार पर पोषक तत्व एवं कृषि इनपुट प्रबंधन को बढ़ावा देना है।

यह अभियान धान आधारित एकल फसल प्रणाली, मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी तथा मृदा कार्बन के घटते स्तर जैसी समस्याओं के समाधान पर केंद्रित है। मृदा परीक्षण आधारित संतुलित उर्वरीकरण एवं एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन पर विशेष जोर देते हुए, यह अभियान रासायनिक, जैविक एवं कार्बनिक स्रोतों के समन्वित उपयोग के माध्यम से नाइट्रोजन के अत्यधिक उपयोग को कम करने का प्रयास कर रहा है। इस अभियान में एकीकृत कृषि प्रणाली दृष्टिकोण को अपनाते हुए फसल विविधीकरण, दलहनी फसलों का समावेश, कम्पोस्टिंग, मल्चिंग तथा जैविक अवशेषों के पुनर्चक्रण को बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही, एआई आधारित सटीक कृषि एवं नैनो उर्वरकों जैसी नवीन तकनीकों के उपयोग को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे कृषि में दक्षता एवं स्थायित्व बढ़ाया जा सके।

कार्यक्रम के अंतर्गत किसानों को मृदा परीक्षण किट के माध्यम से यह प्रदर्शित किया गया कि मृदा नमूने कैसे लिए जाते हैं, परीक्षण कैसे किया जाता है, तथा संतुलित उर्वरीकरण के लिए यह क्यों आवश्यक है।

इस अभियान में 300 से अधिक किसानों एवं विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी की। यह कार्यक्रम भा.कृ.अनु.प.-आईआईएबी, राँची के वैज्ञानिकों की पाँच समर्पित टीमों द्वारा संचालित किया गया, जिनमें विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ शामिल थे।

अभियान के दौरान कृषि को पर्यावरणीय स्थिरता से जोड़ते हुए अनेक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। किसानों को रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक एवं असंतुलित उपयोग के दुष्प्रभावों के बारे में भी विस्तार से बताया गया। इसके कारण मृदा की गुणवत्ता में गिरावट, मृदा कार्बन में कमी, पोषक तत्वों का असंतुलन तथा दीर्घकालीन उत्पादकता में गिरावट जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। साथ ही, जल प्रदूषण, पर्यावरणीय असंतुलन तथा पशु एवं मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को भी स्पष्ट किया गया।

कार्यक्रम के अंतर्गत वर्मी कम्पोस्टिंग, अजोला उत्पादन तथा बतख की खाद के उपयोग पर प्रदर्शन आयोजित किए गए, जिससे यह बताया जा सके कि स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके किस प्रकार प्रभावी ढंग से पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण किया जा सकता है। किसानों को ढैंचा एवं टेफ्रोसिया जैसी हरी खाद फसलों के बारे में जानकारी दी गई, जो मृदा उर्वरता बढ़ाने, नाइट्रोजन स्थिरीकरण एवं मृदा स्वास्थ्य सुधार में सहायक होती हैं। इसके अतिरिक्त, गोबर, मुर्गी खाद एवं बकरी खाद जैसे विभिन्न पशु अपशिष्टों के पोषक महत्व तथा उनके सही उपयोग की विधियों पर भी जानकारी प्रदान की गई।

किसानों को हरी खाद के महत्व के बारे में जागरूक किया गया, जिससे मृदा कार्बन में वृद्धि तथा दीर्घकालीन मृदा उत्पादकता बनाए रखने में सहायता मिलती है। साथ ही, नैनो उर्वरकों के उपयोग से पोषक तत्व उपयोग दक्षता, फसल उत्पादन, पर्यावरणीय स्थिरता में वृद्धि तथा लागत में कमी के लाभों के बारे में भी बताया गया।

यह अभियान गांवों में भ्रमण, किसानों के साथ निरंतर संवाद एवं परामर्श सेवाओं के माध्यम से जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। किसानों को कृषि प्रणाली में दलहनी फसलों के महत्व के बारे में बताया गया, विशेष रूप से वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण में उनकी भूमिका एवं रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की क्षमता पर जोर दिया गया। किसानों को अनाज एवं तिलहन फसलों के साथ दलहनी फसलों की अंतरवर्ती खेती के मॉडल्स पर प्रशिक्षण दिया गया, जिससे संसाधनों का बेहतर उपयोग एवं उत्पादन की स्थिरता सुनिश्चित की जा सके। इसके साथ ही, दलहनी फसलों को शामिल करते हुए उपयुक्त फसल चक्रों की जानकारी दी गई, जिससे मृदा उर्वरता बनाए रखने एवं कीट एवं रोगों की समस्या को कम करने में मदद मिलती है।

दलहनी फसलों की खेती से संबंधित व्यावहारिक जानकारी जैसे बीज उपचार, बुवाई का समय, दूरी एवं पोषक तत्व प्रबंधन के बारे में भी विस्तार से बताया गया। किसानों को यह भी समझाया गया कि दलहनी फसलें मृदा में कार्बनिक पदार्थ बढ़ाने, मृदा संरचना सुधारने एवं सतत कृषि प्रणाली को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। काउपी, चना, मसूर, मूंग एवं अरहर जैसी फसलों पर आधारित सफल फसल प्रणालियों के उदाहरण साझा किए गए, ताकि अधिक से अधिक किसान इन्हें अपनाने के लिए प्रेरित हो सकें। समग्र रूप से, यह अभियान मृदा स्वास्थ्य सुधार, इनपुट उपयोग दक्षता बढ़ाने तथा सतत एवं सशक्त कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने की दिशा में निरंतर प्रगति कर रहा है।

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