(भारत भूषण से)मुंबई , अप्रैल 12 -- भाग-दौड़ और शोर-शराबे से भरी इस दुनिया में सुकून से भरी एक आवाज का थम जाना किसी गहरी त्रासदी से कम नहीं।सब की प्रिय 'आशा ताई' रविवार को इस दुनिया से चली गयीं, यह एक तथ्य से ज्यादा भावनात्मक त्रास है।
दुनिया भर के संगीत प्रेमियों के बीच 'आशा ताई' के नाम से मशहूर आशा भोसले को शनिवार को दिल का दौरा पड़ने के बाद मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, तभी से उनके चाहने वाले उनकी सलामती की दुआएं कर रहे थे 'अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं'।
लेकिन रविवार दोपहर जब उनके बेटे आनंद भोसले ने उनकी मृत्यु की पुष्टि की तो न जाने कितने दिलों को एक चंचल आवाज चीरती हुई गुजर गयी 'यही कहोगे तुम सदा, कि दिल अभी भरा नहीं...नहीं...नहीं।'सोशल मीडिया पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा आशा ताई के निधन पर व्यक्त किये गये दुख में हम सभी का यह दुख भी प्रतिबिंबित होता है, "आशा भोसले के निधन ने संगीत की दुनिया में एक खालीपन छोड़ दिया है।"चंचल और मदहोश आवाज की इस मल्लिका का जन्म आठ सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में पंडित दीनानाथ मंगेशकर के घर में हुआ था। पिता शास्त्रीय गायक थे, इसलिए संगीत भी विरासत में मिला था। संगीत की इस विरासत के साथ-साथ गरीबी भी मिली थी, जिसने छोटी सी आशा को कम उम्र में ही अपनी बड़ी बहन लता के साथ गाना गा कर घर चलाने की जिम्मेदारी सौंप दी।
मात्र 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना पहला हिंदी गाना गाया वर्ष 1948 में आई फिल्म चुनरिया के लिए, जिसके बोल थे- सावन आया। इस फिल्म के लिए उनकी बड़ी बहन लता और गीता दत्त ने भी आवाज दी थी।
यह वह दौर था जब हिंदी सिनेमा में शमशाद बेगम और गीता दत्त जैसी दिग्गज गायिकाओं का राज था। बड़ी बहन लता मंगेशकर भी अपनी सुरीली आवाज से पहचान बना रही थीं। ऐसे में आशा भोसले को वहीं गाने मिलते जो इन प्रमुख गायिकाओं द्वारा ठुकरा दिये जाते, लेकिन आशा ने अपनी मदहोश और चंचल आवाज के बल पर उन ठुकराए हुए गानों में ऐसा जान डाला कि धीरे-धीरे वह इन दिग्गज गायिकाओं की पंक्ति में आकर खड़ी हो गयीं।
उनकी आवाज रंग-बिरंगे फूलों से सजे गुलदस्ते की तरह थी, जिसमें कहीं मादकता थी, तो कहीं प्रेम की मधुरता। जब वह 'खतूबा' गाती थीं तो संगीत प्रेमियों को मदहोशी में झूमने के लिए मजबूर कर देती थीं, लेकिन जब 'दो लफ्जों की है दिल की कहानी' गाती तों लगता जैसे हर किसी की दिल की कहानी सुना रही हों।
आशा ताई की आवाज की रेंज चंचलता से चलते हुए गजल के ठहराव तक इस प्रकार ठहर जाती कि लगता यह आवाज सिर्फ गज़ल गायकी के लिए ही बनी है।
उमराव जान में उनके गाये हुए गानों को कौन भूल सकता है! जब वह गाती हैं 'इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं' तो रील्स की दुनिया में मगन युवा पीढ़ी भी कहने के मजबूर हो जाती है- इस आवाज की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं।
संक्षेप में कहें तो उनकी आवाज में पहाड़ों से निकली युवा नदी की कलकल है, तो मैदान में बहती शांत नदी की स्थिरता। नदी जैसे सदियों से सभ्यताओं के लिए जीवन का स्रोत रही है, आशा भोसले की आवाज कई पीढियों के लिए शांति का स्रोत। साठ के दशक के नौजवान हों या फिर आज के जेन-जी उनकी आवाज का जादू सभी पर बरकरार है और आने वाली पीढियों पर भी इस आवाज का जादू वैसे ही बरकरार रहेगा।
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