नयी दिल्ली , फरवरी 17 -- उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि भाषण व्यक्ति की सोच का प्रतिबिंब होता है और हेट स्पीच से निपटने की असली चुनौती केवल शब्दों को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि उन विचारों को सुधारना और समाप्त करना है, जो ऐसे वक्तव्यों को जन्म देते हैं।
उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका रूप रेखा वर्मा द्वारा दायर की गई है, जिसमें मांग की गई है कि संवैधानिक पदाधिकारियों के सार्वजनिक भाषण मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न करें, इस संबंध में स्पष्ट घोषणा की जाए।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, "भाषण की उत्पत्ति विचार से होती है। विचार को कैसे नियंत्रित करेंगे? हमें उन विचारों को मिटाना होगा जो संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ जाते हैं।" उन्होंने कहा कि केवल दिशा-निर्देश बना देने से समस्या का समाधान नहीं होगा और राजनीतिक दलों व नेताओं को भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना चाहिए तथा संयम बरतना चाहिए।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत पहले ही कौशल किशोर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अमीश देवगन बनाम भारत संघ जैसे मामलों में कई सिद्धांत निर्धारित कर चुकी है। उन्होंने सवाल किया कि क्या उन सिद्धांतों का पालन हो रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसी याचिकाएं अत्यधिक सामान्य नहीं होनी चाहिए और इसे लोकप्रियता हासिल करने का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि संवैधानिक चिंतन के रूप में देखा जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि इस तरह की चुनौती चयनात्मक नहीं हो सकती। इसे पूरे राजनीतिक परिदृश्य पर समान रूप से लागू होना चाहिए और किसी विशेष व्यक्ति या सार्वजनिक पदाधिकारी को निशाना नहीं बनाना चाहिए।
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