शिमला , फरवरी 16 -- हिमाचल प्रदेश विधानसभा का बजट सत्र सोमवार को यहाँ राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल के संक्षिप्त औपचारिक अभिभाषण के साथ शुरू हुआ। यह सत्र के पहले चरण की शुरुआत है, जो 18 फरवरी तक जारी रहने वाला है।
राज्यपाल ने सदस्यों को अभिवादन के साथ अपने अभिभाषण की शुरूआत की और सार्थक कार्यवाही के लिए अपनी शुभकामनाएँ दीं। हालाँकि, उन्होंने सदन को सूचित किया कि वह तैयार पाठ के पैराग्राफ 3 से 16 तक नहीं पढ़ेंगे क्योंकि ये हिस्से एक संवैधानिक निकाय और उससे संबंधित मुद्दों के संदर्भ में थे। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि 'मेरी सरकार' की उपलब्धियों का विवरण देने वाले बाद के पैराग्राफ सदस्यों के बीच बहस के विषय हैं।
श्री शुक्ल ने 14वीं विधानसभा के 11वें सत्र में सदस्यों का स्वागत करते हुए कहा कि यह सदन प्रमुख वित्तीय कार्यों के निष्पादन के लिए बुलाया गया है, जिसमें 2025-26 के लिए अनुदान की अनुपूरक मांगों को पारित करना और 2026-27 के बजट अनुमानों की प्रस्तुति व उन पर चर्चा के साथ-साथ अन्य महत्वपूर्ण मामले शामिल हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि विधानसभा सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों पर रचनात्मक चर्चा की स्थापित परंपरा को बनाए रखेगी।
राज्यपाल का अभिभाषण लगभग तीन मिनट तक चला। अभिभाषण के बाद सदन को थोड़े समय के अवकाश के लिए स्थगित कर दिया गया।
गौरतलब है कि अभिभाषण के पैराग्राफ 3 से 16 में कहा गया था कि राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी ) ने छोटे राज्यों, विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश के राजस्व घाटे को पाटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, 16वें वित्त आयोग ने 'आरडीजी' को बंद करने की सिफारिश की है, जो संविधान के अनुच्छेद 275(1) की भावना के विपरीत है।
इसमें इस बात पर जोर दिया गया था कि 1952 में पहले वित्त आयोग से लेकर 15वें (2020-25) वित्त आयोग तक ने 'आरडीजी' की सिफारिश की थी। पहली बार, आयोग ने कठिन भू-जलवायु परिस्थितियों, छोटी अर्थव्यवस्था और सीमित संसाधन आधार से उत्पन्न होने वाली लागत संबंधी अक्षमताओं के बावजूद छोटे और पहाड़ी राज्यों को 'आरडीजी' प्रदान नहीं किया है।
उल्लेखनीय है कि राज्य का दर्जा मिलने के बाद से हिमाचल प्रदेश को लगातार 'आरडीजी' मिलता रहा है (13वें वित्त आयोग को छोड़कर) और समय के साथ इसका आवंटन आम तौर पर बढ़ता गया है। 15वें वित्त आयोग के तहत, राज्य के लिए 2020-21 से 2025-26 के लिए लगभग 48,630 करोड़ रुपये के 'आरडीजी' की सिफारिश की गई थी, जिसे अब समाप्त कर दिया गया है।
अभिभाषण में यह भी कहा गया कि केंद्रीय करों में हिस्सेदारी और कुछ अनुदानों में वृद्धि हुई है, वहीं शहरी स्थानीय निकायों के अनुदान को 855 करोड़ रुपये से घटाकर 435 करोड़ रुपये कर दिया गया है। 'आरडीजी' को बंद करने से होने वाली बचत (जो पहले 2,94,514 करोड़ रुपये थी) के संबंध में भी कोई सिफारिश नहीं की गई है।
उल्लेखनीय है कि 'आरडीजी' हिमाचल प्रदेश के बजट का लगभग 12.7 प्रतिशत हिस्सा था, जो नगालैंड के बाद देश में दूसरा सबसे अधिक है। इसे वापस लेने से राज्य की वित्तीय स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है। एक पहाड़ी और सीमावर्ती राज्य की सीमित राजस्व सृजन क्षमता को देखते हुए, 'आरडीजी' को बंद करना विकास कार्यक्रमों, कल्याणकारी योजनाओं और आपदा प्रबंधन प्रयासों को बाधित कर सकता है, हालांकि राज्य ने राजकोषीय अनुशासन को मजबूत करने और अतिरिक्त संसाधन जुटाने के लिए कदम उठाए हैं।
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