मुंबई , मार्च 08 -- मुंबई के वर्ली तट के पास अरब सागर में स्थित ऐतिहासिक हाजी अली दरगाह पर दुनिया का सबसे ऊँचा राष्ट्रीय ध्वज स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया है। यह घोषणा रमज़ान के पवित्र महीने के अवसर पर की गई, जिससे इस आध्यात्मिक स्थल की महत्ता और भी उजागर हो गई है।
हाजी अली दरगाह, जो महान सूफी संत पीर हाजी अली शाह बुखारी का मकबरा है, सदियों से धार्मिक सौहार्द और आपसी सम्मान का प्रतीक रही है। यहाँ हर धर्म, आस्था और संस्कृति से जुड़े लोग आते हैं और अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।
यह घोषणा सप्ताहांत में रमज़ान के दौरान आयोजित एक विशेष सहरी समारोह के अवसर पर की गई। रमज़ान के महीने में इस दरगाह पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैं। बताया गया कि शुरुआत में इस विशेष सहरी कार्यक्रम में केवल कुछ दर्जन लोग शामिल होते थे, लेकिन अब इसमें एक हजार से अधिक लोगों ने भाग लिया।
पंद्रहवीं सदी का यह ऐतिहासिक मकबरा वर्ली तट से लगभग 500 गज की दूरी पर अरब सागर के बीच एक छोटे से द्वीप पर स्थित है। ज्वार-भाटा के दौरान यह दरगाह पूरी तरह अलग- दिखाई देती है और ऊँचे ज्वार के समय यह एक द्वीप की तरह प्रतीत होती है।
हाजी अली दरगाह ट्रस्ट और माहिम मखदूम शाह बाबा दरगाह ट्रस्ट के ट्रस्टी सोहेल खंडवानी ने कहा कि हाजी अली दरगाह भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है और हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहाँ आते हैं। उनके अनुसार देश के विभिन्न हिस्सों के अलावा विदेशों से आने वाले पर्यटक भी इस दरगाह की ज़ियारत करते हैं।
उन्होंने बताया कि दरगाह ट्रस्ट ने महाराष्ट्र सरकार को इस दरगाह के पास स्थित द्वीप पर दुनिया का सबसे ऊँचा राष्ट्रीय ध्वज लगाने का औपचारिक प्रस्ताव दिया है। उनके अनुसार यह परियोजना देशभक्ति, राष्ट्रीय एकता और साझा पहचान का प्रतीक बनेगी।
श्री खंडवानी ने कहा कि ध्वज के लिए विशेष धातु संरचना और मजबूत आधार तैयार किया जाएगा, जबकि ध्वज के लिए विशेष कपड़े का उपयोग किया जाएगा, क्योंकि यह स्थान समुद्र के बीच स्थित है और यहाँ मौसम की परिस्थितियों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
इस अवसर पर आयोजित विशेष सहरी समारोह में विभिन्न धर्मों के धार्मिक नेता भी शामिल हुए, जिनमें हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी, सिख और बौद्ध धर्म के प्रतिनिधि अपनी पारंपरिक वेशभूषा में उपस्थित थे।
श्री खंडवानी ने कहा कि ऐतिहासिक हाजी अली दरगाह भारत के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्रों में से एक है और यह स्थान आस्था, सद्भाव और आपसी सम्मान का प्रतीक है। गुरुवार और शुक्रवार के दिनों में यहाँ विशेष रूप से बड़ी संख्या में ज़ायरीन आते हैं। मुंबई और अन्य क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालु यहाँ दुआ करते हैं और सूफी संत की बरकतें प्राप्त करते हैं।
हाजी अली दरगाह की वास्तुकला हिंद-इस्लामी स्थापत्य शैली का सुंदर उदाहरण है। यह इमारत 1431 में एक समृद्ध मुस्लिम व्यापारी सैयद पीर हाजी अली शाह बुखारी की स्मृति में बनाई गई थी, जिन्होंने मक्का की यात्रा से पहले अपनी सारी सांसारिक संपत्ति त्याग दी थी। पीर हाजी अली शाह बुखारी का संबंध प्राचीन फारसी साम्राज्य के शहर बुखारा (वर्तमान उज़्बेकिस्तान) से था। उन्होंने पंद्रहवीं सदी के दौरान दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा की और बाद में मुंबई में बस गए।
दरगाह का सफेद गुंबद और मीनार उस दौर की मुगल स्थापत्य शैली की याद दिलाते हैं। यह इमारत ऊँची चट्टानों पर बनाई गई थी और बाद में 1916 में ट्रस्ट के कानूनी गठन के बाद इसे वर्तमान स्वरूप दिया गया।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित