नैनीताल , फरवरी 23 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हरिद्वार में रायवाला से भोगपुर के बीच बंद पड़े स्टोन क्रेशरों के प्रार्थना पत्र पर सोमवार को सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता मातृ सदन से दो सप्ताह के अंदर आपत्ति दर्ज करने के लिए कहा है।

न्यायमूर्ति रवीन्द्र मैठाणी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ में कनखल हरिद्वार की मातृ सदन नामक संस्था और अन्य की ओर से दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई हुई। उच्च न्यायालय ने पिछले साल जुलाई में रायवाला से भोगपुर के बीच कथित रूप से अवैध खनन में लगे 48 स्टोन क्रेशर को बंद करने के निर्देश दे दिए थे।

इस आदेश को 34 स्टोन क्रशर मालिकों की ओर से विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी लेकिन उनको वहां से भी कोई राहत नही मिली। उच्च न्यायलय के इस आदेश को संसोधित करने और इस मामले में पक्षकार बनने के लिए कुछ स्टोन क्रेशर की ओर उच्च न्यायालय में प्रार्थना पत्र दिए गए।

कुछ स्टोन क्रेशर की ओर से प्लांट हटाने और भंडारण सामग्री को बेचने की अनुमति मांगी गई। सरकार की ओर से पेश उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी की ओर से भी अदालत से समय की मांग की गयी।

इसी के साथ मातृ सदन की ओर से अदालत से सभी प्रार्थना पत्रों पर आपत्ति दर्ज करने के लिए समय की मांग की गयी। यह भी कहा गया कि इनके द्वारा पर्यावरण की जो क्षति की गई है उसकी भरपाई इन स्टोन क्रेशरों से की जाय। इसके बाद अदालत ने मातृ सदन को आपत्ति दर्ज करने के लिए दो सप्ताह का समय दें दिया। इस प्रकरण में अगली सुनवाई 12 मार्च को होगी।

यहां बता दें कि हरिद्वार मातृ सदन ने जनहित याचिका दायर कर कहा कि हरिद्वार में रायवाला से भोगपुर के बीच गंगा नदी में नियमों को ताक पर रखकर धड़ल्ले से अवैध खनन किया जा रहा है जिससे गंगा नदी के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है। यही नहीं नेशनल मिशन क्लीन गंगा की अवधारणा भी खत्म हो रही हैं।

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