नैनीताल , जनवरी 22 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने नैनीताल जिले में राजमार्गों एवं सड़कों की बदहाल स्थिति और पर्यावरण के साथ हो रहे खिलवाड़ को लेकर दायर जनहित याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई करते हुए सख्त रुख अख्तियार किया और जिला प्रशासन को सड़क किनारे जमा मलबा को हटाने के लिए एक सप्ताह का समय दिया है।

न्यायमूर्ति आलोक महरा की अवकाशकालीन पीठ के समक्ष अनिल यादव की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि नैनीताल जिले की प्रमुख सड़कों हल्द्वानी-नैनीताल, नैनीताल-कालाढूंगी और भवाली-कैंची धाम जैसे व्यस्ततम मार्गों के किनारे और सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक मोड़ों पर निर्माण कार्यों का मलबा डाला जा रहा है।

अदालत ने कहा कि सुरक्षा मानकों को धता बताते हुए सड़कों को डंपिंग जोन बना दिया गया है। यही नहीं सड़कों से सुरक्षा दीवारें और क्रैश बैरियर भी गायब हैं। इससे न केवल यातायात बाधित हो रहा है बल्कि दुर्घटना का खतरा बना हुआ है।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि जंगलों और पर्यटन स्थलों पर प्लास्टिक कचरा और शराब की बोतलें फेंकी जा रही हैं। यह ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमावली, 2016 का खुला उल्लंघन है। इससे वन्यजीवों के साथ-साथ हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी को क्षति पहुंच रही है। याचिका में इसे संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का सीधा हनन बताया गया है।

जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल वर्चुअल रूप से अदालत में पेश हुए और उन्होंने कहा कि सड़कों से मलबा और कूड़ा हटाने के लिए प्रशासन की ओर से युद्ध स्तर पर अभियान चलाया जाएगा। यही नहीं सफाई के लिए आगामी 26 जनवरी से विशेष अभियान चलाया जा रहा है।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित