पटना, अप्रैल 10 -- ंचायत स्तर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और स्थानीय कारीगरों को बाजार उपलब्ध कराने में ग्रामीण हाट अहम भूमिका निभा रहे हैं। मुख्यमंत्री ग्रामीण हाट विकास योजना के तहत आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित ये हाट अब कई परिवारों के लिए स्थायी रोजगार का प्रमुख साधन बन चुके हैं। समस्तीपुर जिले के रोसड़ा प्रखंड का मोतीपुर पंचायत इस योजना की सफलता का सशक्त उदाहरण है। यहां फल-सब्जी, रोजमर्रा की जरूरत के सामानों के साथ-साथ पारंपरिक पंखे भी बिकते नजर आते हैं। ये पंखे उसी पंचायत के वार्ड नंबर 5 के कारीगरों द्वारा ताड़ के पत्तों से बनाए जा रहे हैं।

मोतीपुर पंचायत के वार्ड संख्या पांच में करीब 125 परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी ताड़ के पत्तों से पंखा बनाने का काम कर रहे हैं। इनके द्वारा बनाए गए पंखे न सिर्फ स्थानीय ग्रामीण हाट में, बल्कि बेगूसराय, दरभंगा समेत आसपास के कई जिलों में भी बिक्री हो रहे हैं।

वार्ड सदस्य मोहम्मद इमरान ने बताया कि यह काम उनके पूर्वजों से चला आ रहा है। करीब आठ पीढ़ियों से यह कला इस गांव में जीवित है। इसे बनाने में परिवार का हर सदस्य एक साथ काम करते हैं। पुरुष ताड़ के पत्ते काटकर लाते हैं, महिलाएं सिलाई और रंगाई का काम संभालती हैं। बच्चे भी उत्साह से इस कला को सीखते हैं।

मोहम्मद इमरान ने बताया कि गांव में लगभग दो हजार ताड़ के पेड़ हैं, लेकिन मांग अधिक होने पर आसपास की पंचायतों से पत्ते मंगवाए जाते हैं। पंखा बनाने की पूरी प्रक्रिया करीब 10 दिन की होती है। सबसे पहले अच्छे और नरम पत्तों को चुना जाता है, फिर उन्हें तीन दिन तेज धूप में सुखाया जाता है। सूखने के बाद पत्तों को गोलाकार काटकर सिलाई की जाती है। ताड़ के डंडे को मजबूती से जोड़कर पंखे का हैंडल बनाया जाता है। अंत में रंगाई कर अच्छी तरह सुखाया जाता है। एक परिवार औसतन एक महीने में तीन से चार हजार पंखे तैयार करता है। ये पंखे होलसेल में बाजार पहुंचाए जाते हैं, जहां ये 08 से 10 रुपये प्रति पीस के भाव बिकते हैं। कई परिवार अब इन पंखों को मोतीपुर के ग्रामीण हाट में भी सीधे बेचने आते हैं।

कारीगर बताते हैं कि पहले पंखे को बेचने में काफी मुश्किलें आती थी, लेकिन मुख्यमंत्री ग्रामीण हाट विकास योजना के तहत ग्रामीण हाट खुलने से इन पंखों की बिक्री सही से हो रही है और अब हमारी नई पीढ़ी भी इस काम को सीखने में रुचि दिखा रहे हैं।

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