हल्द्वानी,24फरवरी(वार्ता)उत्तखंड में हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में रेलवे भूमि पर अतिक्रमण से जुड़े बहुचर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्वास को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं।
करीब 50 हजार की आबादी से जुड़े इस संवेदनशील प्रकरण में शीर्ष अदालत ने कहा कि परियोजना से जुड़ा गतिरोध अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रह सकता और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की प्रक्रिया को पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने जिला प्रशासन, राजस्व अधिकारियों और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिए हैं कि मौके पर विशेष पुनर्वास कैंप लगाए जाएं, ताकि प्रभावित परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन करने में सहायता मिल सके। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक परिवार की पात्रता का निर्धारण तभी संभव होगा जब वे योजना के अंतर्गत विधिवत आवेदन प्रस्तुत करेंगे।
पीठ ने यह भी कहा कि अधिकांश प्रभावित परिवार प्रथम दृष्टया आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की श्रेणी में आ सकते हैं, इसलिए यह जरूरी है कि उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति का सही आकलन कर पात्र लोगों को योजना का लाभ दिया जाए। कोर्ट ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव, जिला एवं उपमंडल विधिक सेवा प्राधिकरणों के अधिकारियों को भी कैंप के दौरान स्थल पर उपस्थित रहने के निर्देश दिए हैं, ताकि आवेदन प्रक्रिया सरल और सुगम बनाई जा सके।
अदालत ने निर्देश दिया है कि 31 मार्च 2026 तक 2019 की पुनर्वास नीति के तहत अब तक उठाए गए कदमों पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि नीति के अनुसार किन-किन परिवारों को पुनर्वास का अधिकार प्राप्त होगा। कोर्ट ने कहा कि जब तक सभी पात्र परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन नहीं कर लेते, तब तक पुनर्वास कैंप लगातार आयोजित किए जाते रहें।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि कुछ परिवार छोटे-छोटे भूखंडों के स्वामी के रूप में चिन्हित किए गए हैं और यदि उनकी भूमि परियोजना के लिए ली जाती है तो विधिवत अधिग्रहण प्रक्रिया के तहत ही ली जाएगी। वहीं अतिक्रमणकारियों के संबंध में केंद्र ने कहा कि वे उसी स्थान पर पुनर्वास की मांग पर जोर नहीं दे सकते, क्योंकि यह भूमि बड़े पैमाने पर रेलवे विस्तार और लाइन के रियलाइन्मेंट के लिए आवश्यक है।
रेलवे की ओर से अदालत को अवगत कराया गया कि परियोजना के तहत रेल लाइन के रियलाइन्मेंट के लिए लगभग 30.65 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता है। साथ ही जिन संरचनाओं को ध्वस्त किया गया है, उनके लिए प्रत्येक प्रभावित परिवार को छह महीने तक 2000 रुपये प्रतिमाह की अस्थायी सहायता देने का प्रस्ताव भी रखा गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि पुनर्वास प्रक्रिया स्पष्ट, निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि पात्र परिवारों को योजनाओं का लाभ मिल सके और लंबे समय से चल रहा विवाद समाप्त हो सके। अदालत ने यह भी कहा कि प्रशासन आवेदन प्रक्रिया में सक्रिय सहयोग सुनिश्चित करे और किसी भी पात्र परिवार को वंचित न रखा जाए।
दरअसल, यह मामला हल्द्वानी में रेलवे की भूमि पर कथित अवैध कब्जे को हटाने के खिलाफ दाखिल याचिकाओं से जुड़ा है। इससे पहले उच्च न्यायालय के आदेश के बाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगाई हुई है और राज्य सरकार से पुनर्वास को लेकर ठोस मास्टर प्लान की जानकारी मांगी थी।
अदालत ने संकेत दिया है कि विकास परियोजनाओं और मानवीय पहलुओं के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि परियोजना में अनावश्यक देरी उचित नहीं है और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के साथ ही रेलवे परियोजना से जुड़े कार्यों को भी आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
इस महत्वपूर्ण आदेश के बाद अब जिला प्रशासन पर जिम्मेदारी बढ़ गई है कि वह तय समयसीमा के भीतर पुनर्वास प्रक्रिया को गति दे, पात्र परिवारों की पहचान करे और उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना सहित अन्य सरकारी योजनाओं से जोड़कर स्थायी समाधान सुनिश्चित करे।
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