हरिद्वार , अप्रैल 30 -- उत्तराखंड के हरिद्वार में बहादराबाद स्थित पतंजलि विश्वविद्यालय में गुरुवार को जनजातीय कार्य मंत्रालय के दो दिवसीय चिंतन शिविर की शुरुआत एक व्यापक दृष्टि और ठोस संकल्प के साथ हुई। इस आयोजन ने सिर्फ औपचारिक विमर्श का रूप नहीं लिया, बल्कि इसे नीति, संवेदना और जमीनी अनुभवों के संगम के रूप में देखा गया।
शिविर में केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुअल ओरम, योगगुरु स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण समेत विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने चर्चा को बहुआयामी बना दिया।
पहले दिन की बैठकों में संभाग, संवाद और समाधान की अवधारणा को केंद्र में रखते हुए इस बात पर विस्तार से विचार हुआ कि योजनाएं कागजों से निकलकर वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक कैसे पहुंचें। चर्चा में यह स्वीकार किया गया कि कई योजनाएं अपनी मंशा के अनुरूप प्रभाव नहीं छोड़ पा रहीं, जिनके कारणों की पहचान कर सुधार की दिशा तय करना अब प्राथमिकता है।
श्री ओरम ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस सोच का विस्तार है, जिसमें विकास को समावेशी और परिणामोन्मुख बनाने पर जोर दिया गया है। उन्होंने कहा कि अब समय केवल योजनाएं बनाने का नहीं, बल्कि उनके असर को जमीन पर महसूस कराने का है। जनजातीय समाज के लिए चल रही योजनाओं की हर कड़ी को मजबूत करते हुए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि लाभ बिना बाधा के अंतिम छोर तक पहुंचे।
शिविर में वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य के संदर्भ में यह भी चर्चा हुई कि जनजातीय समाज इस यात्रा का सिर्फ सहभागी नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता कैसे बन सकता है। प्रतिभागियों ने स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग, पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण और आधुनिक कौशल के समावेश को इस दिशा में अहम माना।
इस दौरान स्वामी रामदेव ने विकास की परिभाषा को व्यापक बनाते हुए कहा कि यदि समाज अपनी जड़ों से कट जाता है, तो प्रगति अधूरी रह जाती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक पहचान और जीवनशैली को संरक्षित रखते हुए ही उन्हें आधुनिक अवसरों से जोड़ना होगा।
शिविर में अंत्योदय की अवधारणा बार-बार चर्चा के केंद्र में रही। वक्ताओं का मानना रहा कि जब तक विकास की रोशनी समाज के उस व्यक्ति तक नहीं पहुंचेगी, जो अब तक हाशिए पर है, तब तक प्रगति अधूरी ही मानी जाएगी।
हरिद्वार में चल रहा यह चिंतन शिविर केवल विचार-विमर्श का मंच नहीं, बल्कि एक ऐसी कार्ययोजना की आधारशिला बनता नजर आ रहा है, जो आने वाले वर्षों में जनजातीय समाज को नई दिशा और सशक्त पहचान देने का मार्ग प्रशस्त करेगा।
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