नैनीताल , फरवरी 10 -- उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने स्ट्रीट वेंडरों के मामले को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर मंगलवार को सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ताओं को तीन सप्ताह में प्रतिशपथ पत्र दायर करने के निर्देश दिए हैं।

मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खण्डपीठ में नेशनल हाॅकर फेडरेशन ऑफ इंडिया और अन्य की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई हुई।

याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि उत्तराखण्ड में लगभग 10187 स्ट्रीट वेंडर हैं। सरकार ने स्ट्रीट वेंडर एक्ट, 2014 का अभी तक अनुपालन नहीं किया गया है जिसमें स्ट्रीट वेंडरों के लिए अलग जगह निर्धारत करने का प्रावधान है।

यह भी प्रावधान है कि स्थानीय निकाय द्वारा उन्हें लाइसेंस दिया जाएगा। उन्हें हटाने से पूर्व समाचार पत्रों में विज्ञप्ति जारी की जाएगी और स्ट्रीट वेंडर अपनी पहचान बनाए रखने के लिए अपने पास लाइसेंस, आधारकार्ड साथ रखेंगे।

उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने 2014 में जारी अपने निर्णय में सभी राज्य सरकारों को चार माह में सभी स्ट्रीट वेंडरों का सर्वे कर एक स्ट्रीट टाउन वेंडर कमेटी का गठन करने के निर्देश दिए थे। जिसमें सम्बन्धित स्थानीय निकाय, पुलिस प्रशासन, व्यापार मंडल तथा अन्य लोग शामिल होंगे।

आगे कहा गया कि उत्तराखंड भी अभी तक शीर्ष अदालत के निर्देश का अनुपालन नहीं किया गया है। न तो सर्वे हुआ और न वेंडिंग जोन के साथ कमेटी का गठन हुआ है। नतीजतन आये दिन इन लोगों को परेशान किया जाता है। जनहित याचिका में यह भी कहा गया है कि सामान जब्त करने और तोड़ने का अधिकार प्रशासन को नहीं है।

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