बेंगलुरु , नवंबर 06 -- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को कहा कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) भारत की आर्थिक मजबूती का आधार हैं।

श्री भागवत बेंगलुरु में इंडियन मेनुफेक्चरिंग शो (आईएमएस) 2025 के सातवें संस्करण को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा, "भारत की आर्थिक ताकत कुछ बड़े उद्योगों में नहीं, बल्कि लाखों छोटे हाथों के एक साथ काम करने में निहित है। जब उद्यमी केवल लाभ के लिए प्रतिस्पर्धा करने के बजाय सहयोग करते हैं, तो राष्ट्र, समाज और मानवता सभी की जीत होती है।"आरएसएस प्रमुख ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एमएसएमई न केवल अर्थव्यवस्था को बाजार में आए अचानक उतार-चढ़ाव या टैरिफ में बदलाव से बचाते हैं, बल्कि रोजगार भी पैदा करते हैं, पर्यावरण का संरक्षण करते हैं और व्यक्तियों को सशक्त बनाते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले पाँच से दस वर्षों में भारत का एमएसएमई क्षेत्र लगातार परिपक्व हुआ है और वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बना है। उन्होंने कहा कि ये उद्यम देश के आत्मनिर्भरता के दृष्टिकोण को व्यावहारिक रूप दे रहे हैं।

श्री भागवत ने सहयोग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उद्यमियों से भाईचारा और पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा देने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, "बड़े उद्योगों और छोटे उद्यमों को एक-दूसरे का पूरक होने चाहिए। इससे संतुलित विकास सुनिश्चित होता है और कारीगरों से लेकर उद्योगपतियों तक, उत्पादकों से लेकर उपभोक्ताओं तक सभी हितधारकों को लाभ होता है।"उन्होंने लघु उद्योगों का समर्थन करने वाली प्रमुख संस्था लघु उद्योग भारती की लघु उद्यमियों के लिए एक मंच बनाने के लिए प्रशंसा की।

आरएसएस प्रमुख ने भारत के ऐतिहासिक आर्थिक मॉडल को याद करते हुए कहा कि पहली सदी से लेकर 1600 ई. तक कृषि, व्यापार और उद्योग सामंजस्यपूर्ण रूप से सह-अस्तित्व में थे और एक-दूसरे के पूरक थे। खेतों में काम करने वाले मज़दूर, फ़ैक्टरी कर्मचारी और अंतर्राष्ट्रीय व्यापारी एक एकीकृत प्रणाली में भाग लेते थे जिसने समृद्धि और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा दिया।

उन्होंने कहा, "हमें आज सतत और समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए इस एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्निर्माण करना होगा।"श्री भागवत ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि भारतीय उद्यमिता केवल लाभ से नहीं, बल्कि कर्तव्य, सेवा और सामाजिक कल्याण से प्रेरित होती है। उन्होंने कहा, "व्यापार और उद्योग को केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए ही नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक प्रगति के लिए भी कार्य करना चाहिए। यह दृष्टिकोण वैश्विक मंच पर भारत की विश्वसनीयता को मज़बूत करता है।"श्री भागवत ने कहा कि उत्कृष्टता भारत की वैश्विक पहचान का मूल है। उन्होंने कहा, "हमारे उत्पाद और सेवाएँ उच्चतम मानक की होनी चाहिए। जब हम उत्कृष्टता प्राप्त करेंगे, तो दुनिया इस पर ध्यान देगी और हमारे तरीके दूसरों के लिए एक मानक स्थापित करेंगे।" उन्होंने उद्यमियों को छोटी शुरुआत करने लेकिन बड़ा सोचने के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे उनका प्रभाव परिवारों और गाँवों से पूरे राष्ट्र और अंततः मानवता तक फैले।

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