रायपुर/बीजापुर, फरवरी 11 -- छत्तीसगढ़ में बीजापुर के विधायक विक्रम मंडावी को नक्सल प्रभावित गांवों के प्रस्तावित दौरे पर जाने से पुलिस अधीक्षक जितेंद्र यादव द्वारा उन्हें रोके जाने का मामला राजनीतिक विवाद का कारण बन गया है।

पुलिस अधीक्षक बीजापुर की ओर से आज जारी पत्र में सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए विधायक से 12 फरवरी को प्रस्तावित भ्रमण स्थगित करने का अनुरोध किया गया है। इस घटनाक्रम पर नाराज विधायक ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से शिकायत की, जिसके बाद श्री बघेल ने सोशल मीडिया पर पत्र साझा कर छत्तीसगढ़ सरकार की नीतियों पर तीखे सवाल उठाए हैं।

विधायक मंडावी ने बुधवार को यूनीवार्ता से चर्चा में कहा कि वह अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के बीच जाने से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने कहा, "हमने जनता से वोट लिया है, उनके सुख-दुख में साथ रहना हमारा दायित्व है। समय-समय पर ग्रामीणों के आमंत्रण मिलते हैं और उनकी समस्याओं को जानना जनप्रतिनिधि का कर्तव्य है। ऐसे दौरों से सरकार के दावों की जमीनी हकीकत भी सामने आती है।"श्री मंडावी ने आरोप लगाया कि पूरे बस्तर क्षेत्र में खनिज संपदाओं की खुली लूट चल रही है और जनप्रतिनिधियों को गांवों में जाने से रोकना लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार के समय जनप्रतिनिधि बिना रोक-टोक अंदरूनी इलाकों में जाते रहे, तब ऐसी पाबंदियां नहीं थीं।

एसपी यादव द्वारा जारी पत्र में उल्लेख है कि विधायक का प्रस्तावित दौरा भोपालपटनम और फरसेगढ़ क्षेत्र के ग्राम पिल्लूर, एड़ापल्ली, सण्ड्रा, छोटेकाकलेर एवं गुण्डम में था, जहां सड़क मार्ग कच्चा है तथा नक्सल गतिविधियों की सूचना है। पत्र में स्पष्ट कहा, "सुरक्षागत कारणों से उक्त ग्रामों की यात्रा स्थगित करने का अनुरोध किया जाता है।" पत्र की प्रतिलिपि संबंधित पुलिस अधिकारियों और कंट्रोल रूम को भी भेजी गई है।

इस पत्र को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री ने राज्य सरकार पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि केंद्रीय गृह मंत्री बार-बार दावा कर रहे हैं कि मार्च 2026 तक नक्सलवाद जड़ से समाप्त हो जाएगा लेकिन दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार के अधिकारी विधायक को ही क्षेत्र में जाने से रोक रहे हैं। श्री बघेल ने सवाल किया, "अगर नक्सलवाद खत्म हो रहा है तो जनप्रतिनिधियों पर पाबंदी क्यों? सच क्या है - सरकार का दावा या जमीन की हकीकत?" उन्होंने यह भी लिखा कि कांग्रेस सरकार के समय विधायक और जनप्रतिनिधि बेरोकटोक जनता के बीच जाते थे और संवाद का माहौल बना रहता था।

इस विवाद ने प्रदेश की कानून-व्यवस्था और नक्सल मोर्चे पर सरकार के दावों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। विपक्ष का कहना है कि सुरक्षा के नाम पर जनप्रतिनिधियों को रोकना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है, जबकि प्रशासन इसे विशुद्ध रूप से सुरक्षा से जुड़ा एहतियाती कदम बता रहा है। मामले को लेकर बीजापुर से लेकर राजधानी तक राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है।

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