शिमला , दिसंबर 16 -- ब्रहम समाज के अनुयायियों ने मंगलवार काे स्पष्ट किया कि उच्चतम न्यायालय के समक्ष उनकी विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) संपत्ति या प्रबंधन पर किसी बड़े दावे के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ हिमालयन ब्रह्म समाज मंदिर में पूजा-पाठ तक ही सीमित थीं।
उच्चतम न्यायालय ने हिमालयन ब्रह्म समाज मंदिर से जुड़े मामले में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखकर निचली अदालत को इस विवाद को सुलझाने का निर्देश देते हुए उनकी विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी)खारिज कर दी है।
अनुयायियों ने बताया कि एसएलपी उच्च न्यायालय द्वारा उनकी याचिका पर सुनवाई से इनकार करने को चुनौती देने और भक्तों को मंदिर में प्रार्थना करने की अनुमति मांगने के लिए दायर की गई थी।
न्यायाधीश एमएम सुंदरेश और न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने हालांकि दखल देने से इनकार किया और कहा कि याचिकाकर्ताओं को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के पहले के फैसले के अनुसार जिला अदालत का रुख करना चाहिए। शीर्ष न्यायालय को उच्च न्यायालय के आदेश में दखल देने का कोई आधार नहीं मिला और उसने मौजूदा कानूनी स्थिति को बनाए रखते हुए एसएलपी खारिज कर दी।
अनुयायियों ने कहा कि शीर्ष न्यायालय ने दखल देने से इनकार करते हुए फिर से पुष्टि की कि संपत्ति और पूजा के अधिकारों से संबंधित मुद्दों पर फैसला करने के लिए सिविल कोर्ट सही मंच है। इस प्रकार उच्च न्यायालय के पहले के फैसले को बरकरार रखा गया है।उन्होंने इस बात पर बल दिया कि शीर्ष न्यायालय ने विवाद के गुण दोषों पर फैसला नहीं किया और सिर्फ अपने असाधारण अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया।
एक संयुक्त बयान में हिमालयन ब्रह्म समाज के अनुयायियों ने आरोप लगाया कि रामकृष्ण मिशन से जुड़े लोगों द्वारा उच्चतम न्यायालय की कार्यवाही के दायरे और परिणाम के बारे में 'गुमराह करने वाला और झूठा प्रचार' फैलाया जा रहा है।
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