नयी दिल्ली , नवंबर 20 -- उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में खराब होती वायु गुणवत्ता के बीच निर्माण गतिविधियों पर गुरूवार को पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से इनकार करते हुए कहा कि पर्यावरण की चिंताओं को विकासात्मक ज़रूरतों के साथ संतुलित किया जाना चाहिये।
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अगुवाई वाली पीठ ने राष्ट्रीय राजधानी में वायु प्रदूषण से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा, "हम कोई विशेषज्ञ नहीं हैं।"पीठ ने कहा कि वह दिल्ली के बिगड़ते वायु गुणवत्ता सूचकांक(एक्यूआई) को देखते हुए कोई बड़ा निर्देश जारी करने के लिए तैयार नहीं है और पर्यावरण की सुरक्षा विकास के साथ साथ होनी चाहिये। न्यायालय ने बार-बार होने वाले प्रदूषण संकट पर गंभीर चिंता जताते हुए इस बात पर ज़ोर दिया कि अस्थायी उपाय काफी नहीं हैं।
पीठ ने केंद्र सरकार से लंबे समय के स्थायी उपाय करने का आग्रह करते हुए कहा कि दिल्ली के प्रदूषण से निपटने की मुख्य ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की है। पीठ ने यह भी कहा कि निर्माण गतिविधियों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से गंभीर सामाजिक- आर्थिक नतीजे हो सकते हैं क्योंकि जिससे लाखों लोग अपनी रोजी-रोटी के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर हैं।
न्यायालय के सवालों का जवाब देते हुए केंद्र ने कहा कि चुनौती यह तय करने में है कि मानवाधिकारों का उल्लंघन किए बिना प्रदूषण को कितना कम किया जा सकता है। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने फेफड़ों के कैंसर से होने वाली ज़्यादा मौतों का हवाला देते हुए न्यायालय से कैलिफोर्निया जैसे सख्त वायु गुणवत्ता मानक अपनाने की अपील की।
केन्द्र सरकार का पक्ष रखते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने तर्क दिया कि विकसित देशों में इस्तेमाल होने वाले प्रदूषण मानक भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर सीधे लागू नहीं किए जा सकते, जो अभी भी आद्योगिकरण के दौर से गुज़र रही हैं।
पीठ ने दोहराया कि वह "कोई विशेषज्ञ निकाय नहीं है" और कैलिफोर्निया-आधारित कड़े मानकों को ज़रूरी बनाने वाले निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया।
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