नयी दिल्ली , अप्रैल 21 -- उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को केरल के एक वकील द्वारा दायर याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा जिसमें राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम, 2008 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए मुद्दे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने केंद्र सरकार, राष्ट्रीय जांच एजेंसी और केरल सरकार को नोटिस जारी करते हुए टिप्पणी किया कि पुलिस स्टेशन न होते हुए क्या एनआईए एफआईआर दर्ज कर सकती है?केरल के वकील मोहम्मद मुबारक एआई ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की है। उन्हें दिसंबर 2022 में गिरफ्तार किया गया था, जब एनआईए ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के नेताओं और सदस्यों द्वारा कथित तौर पर किए गए अपराधों की जांच अपने हाथ में ली थी। वे लगभग एक साल पांच महीने तक हिरासत में रहे और जून 2024 में केरल उच्च न्यायालय ने उन्हें जमानत दे दी।

शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार, राष्ट्रीय जांच एजेंसी और केरल सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया और याचिकाकर्ता को अपना प्रत्युत्तर दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया। न्यायालय ने निर्देश दिया कि ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद न्यायालय के पुनः खुलने पर मामले की सुनवाई 14 जुलाई को सूचीबद्ध की जाए।

याचिकाकर्ता मोहम्मद मुबारक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने एनआईए अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों का हवाला दिया, जिसके तहत राष्ट्रीय जांच एजेंसी का गठन किया गया है।

अधिनियम की धारा 6(5) की बात करते हुए, जो अनुसूचित अपराधों की जांच से संबंधित है, उन्होंने कहा कि यदि केंद्र की राय है कि कोई अनुसूचित अपराध किया गया है और अधिनियम के तहत जांच की आवश्यकता है, तो वह स्वतः संज्ञान लेते हुए एजेंसी को इसकी जांच करने का निर्देश दे सकता है।

याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह है कि एनआईए अधिनियम संविधान के संघीय ढांचे का उल्लंघन करता है क्योंकि यह केंद्र सरकार को एक ऐसी जांच एजेंसी बनाने में सक्षम बनाता है जो राज्य पुलिस बलों की शक्तियों को दरकिनार कर देती है।

याचिकाकर्ता ने एनआईए अधिनियम की संवैधानिकता पर सवाल उठाते हुए तर्क दिया कि "पुलिस" राज्य सूची के अंतर्गत आती है और इसलिए संसद के पास राज्य पुलिस बलों पर सर्वोच्च शक्तियों वाली एक केंद्रीय जांच एजेंसी स्थापित करने की क्षमता नहीं है।

याचिका के अनुसार, यह अधिनियम राज्य सूची वाले क्षेत्र में केंद्र सरकार को नियंत्रण का अधिकार देकर संघवाद के संवैधानिक संतुलन को बिगाड़ता है। याचिका में अधिनियम की परिचालन संरचना, विशेष रूप से धारा 6 से 10 को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि ये धाराएं केंद्र सरकार को असीमित एवं अनियंत्रित शक्तियां प्रदान करती हैं।

यह तर्क दिया गया है कि इन प्रावधानों के अंतर्गत केंद्र सरकार राज्यों की सहमति के बिना ही उनके मामलों की जांच अपने हाथ में ले सकती है, जिससे प्रभावी रूप से एक समानांतर राष्ट्रीय पुलिस संरचना तैयार हो जाएगा। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस तरह की व्यवस्था सार्वजनिक व्यवस्था और पुलिसिंग से संबंधित मामलों में राज्य सरकारों की स्वायत्तता को कमजोर करती है और शक्तियों के संघीय वितरण को भी प्रभावित करती है।

याचिकाकर्ता ने यह घोषणा करने की मांग की है कि एनआईए अधिनियम असंवैधानिक है क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 20 और 21 का उल्लंघन करता है और संवैधानिक योजना के अंतर्गत परिकल्पित संघीय संरचना को कमजोर करता है। याचिकाकर्ता ने तथ्यों के आधार पर शिकायत की है, जिसमें तर्क दिया गया है कि एनआईए द्वारा उसके मामले में एफआईआर दर्ज करना, जांच करना और अंतिम रिपोर्ट दाखिल करना गंभीर पूर्वाग्रह का कारण बना है।

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