सतीश सिंहलखनऊ , अप्रैल 07 -- उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी तपिश अभी से देखी जा रही है। यूजीसी के नए नियमों को लेकर सवर्ण वोटों की नाराजगी के बीच इस बार सत्ता के केंद्र में दलित वोट बैंक बना हुआ है। प्रदेश की करीब 21 प्रतिशत दलित आबादी न सिर्फ आरक्षित सीटों बल्कि सामान्य सीटों पर भी निर्णायक भूमिका निभाती है।
यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) तीनों ही दल इस वर्ग को अपने पक्ष में करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं। वर्तमान में यूजीसी के नए नियमों को लेकर सवर्ण समाज के बीच भाजपा के प्रति असंतोष देखा जा रहा है। हालांकि भाजपा इस तरह की नाराजगी से इंकार कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर यह मुद्दा बातचीत का हिस्सा बन चुका है। इसी बीच विकल्प के तौर पर बसपा सुप्रीमो मायावती के बयान और उनके शासनकाल के कानून-व्यवस्था की चर्चाएं ग्रामीण इलाकों में फिर सुनाई देने लगी हैं। हालांकि, चुनाव अभी दूर हैं और राजनीतिक समीकरण समय के साथ बदल रहते हैं।
भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी रणनीति बदलते हुए गैर-जाटव दलितों जैसे पासी, वाल्मीकि और अन्य समुदायों पर खास फोकस किया है। केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं, जैसे मुफ्त राशन, आवास, शौचालय और आयुष्मान योजना के जरिए भाजपा ने लाभार्थी वर्ग तैयार किया है, जिसे वह वोट में बदलने की कोशिश में है। साथ ही, डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों और स्मारकों को प्रमुखता देकर पार्टी सामाजिक संदेश भी दे रही है।
एक दिन पूर्व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरफ से पार्टी के स्थापना दिवस के दिन राज्य में डॉ. अंबेडकर की सभी प्रतिमाओं पर सुरक्षात्मक छत्र देने की घोषणा को इसी रूप से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, जाटव वोट बैंक में भाजपा की पकड़ अभी भी सीमित मानी जाती है।
वहीं, लोकसभा के चुनावी नतीजे से उत्साहित समाजवादी पार्टी अब अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम समीकरण से आगे बढ़ते हुए दलितों को जोड़ने में जुटी है। पार्टी ने बसपा से आए नेताओं को आगे कर दलित समाज में पैठ बनाने की कोशिश तेज कर दी है। दलित वोटरों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए पार्टी कांशीराम की जयंती से लेकर डॉ. अंबेडकर जयंती मनाने की परंपरा को शुरू कर लुभाने में लगी है।
"पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक)" फॉर्मूला सपा की रणनीति का केंद्र बन गया है। इसके तहत सपा सामाजिक न्याय और सम्मान के मुद्दों को उठाकर भाजपा के खिलाफ व्यापक गठजोड़ बनाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, सपा के सामने चुनौती यह है कि वह दलित वोटरों का भरोसा कितनी मजबूती से जीत पाती है। क्योंकि दलित वोट का भरोसा जीत पाना सपा के लिए टेढ़ी खीर है।
दूसरी ओर, बहुजन समाज पार्टी अपने पारंपरिक जाटव वोट बैंक को बचाए रखने पर सबसे ज्यादा जोर दे रही है। साथ ही गेस्ट हाउस कांड, प्रमोशन में आरक्षण और दलित महापुरुषों के नाम पर बने जिलों की बात को लगातार उठा कर सपा से आगाह कर रही हैं।
मायावती अब भी दलित राजनीति का बड़ा चेहरा मानी जाती हैं और पार्टी "साइलेंट वोटर" रणनीति के तहत चुनावी तैयारी कर रही है। बसपा एक बार फिर ब्राह्मण-दलित समीकरण को साधने की कोशिश में है, लेकिन संगठन की सक्रियता और बदलते राजनीतिक समीकरण उसके सामने बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
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