बेंगलुरु , अप्रैल 04 -- आधुनिक चिकित्सा के क्षेत्र में रोबोटिक्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते प्रभाव के बीच विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि मशीनें डॉक्टरों की जगह नहीं ले रही हैं, बल्कि उन्हें अधिक सक्षम बना रही हैं। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में आयोजित 'बॉसकॉन 2026' के दौरान देश के अग्रणी ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञों ने इस विचार पर अपनी मुहर लगाई।

बेंगलुरु ऑर्थोपेडिक सोसाइटी के 29वें वार्षिक सम्मेलन 'बॉसकॉन 2026' का आयोजन 4 और 5 अप्रैल को कोरमंगला क्लब में होसमत हॉस्पिटल्स के सहयोग से किया गया। इस कार्यक्रम का उद्घाटन कर्नाटक के परिवहन और मुजराई मंत्री रामलिंगा रेड्डी, येनपोया विश्वविद्यालय के प्रो-चांसलर डॉ. शांताराम शेट्टी और विधायक धीरज मुनिराज की उपस्थिति में हुआ।

सम्मेलन के दौरान विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि ऑर्थोपेडिक्स में रोबोटिक्स, एआई और मिनिमली इनवेसिव तकनीकों के आने से सटीकता तो बढ़ी है, लेकिन निदान, योजना और सर्जरी को अंजाम देने की मुख्य जिम्मेदारी अब भी सर्जन के पास ही है। विशेषज्ञों का सर्वसम्मत मत था कि "मशीनें सहायता कर सकती हैं, लेकिन वे निर्णय नहीं ले सकतीं-निर्णय लेने का काम मानवीय मस्तिष्क ही करता है।"डॉक्टरों ने इंटरनेट से मिलने वाली अधूरी जानकारी के प्रति भी मरीजों को आगाह किया। उन्होंने कहा कि हालांकि जागरूकता अच्छी है, लेकिन ऑनलाइन उपलब्ध अपुष्ट जानकारी कई बार भ्रम और अनावश्यक चिंता पैदा करती है, इसलिए सटीक उपचार के लिए विशेषज्ञों की सलाह अनिवार्य है। इस वर्ष के सम्मेलन का विषय 'कीपिंग पेस इन ऑर्थोपेडिक्स: इवॉल्विंग विद एविडेंस' रखा गया था। यह विषय नवाचार और बुनियादी सिद्धांतों के बीच संतुलन को दर्शाता है।

बेंगलुरु ऑर्थोपेडिक सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. सुबोध शेट्टी और डॉ. शांताराम शेट्टी ने कहा कि ऑर्थोपेडिक्स एक कला और विज्ञान दोनों है, जिसे केवल व्यावसायिक हितों के बजाय वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए। तकनीक के अलावा, सम्मेलन में बुजुर्गों में ऑस्टियोपोरोसिस और अर्थराइटिस जैसी समस्याओं के प्रबंधन, सड़क सुरक्षा और ट्रॉमा केयर जैसे विषयों पर भी विस्तृत चर्चा की गई।

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