कपूरथला , दिसंबर 18 -- कांग्रेस विधायक सुखपाल सिंह खैरा ने पंजाब में हाल ही में हुए ब्लॉक समिति और जिला परिषद चुनावों का पुलिस शक्ति, सिविल प्रशासन और चुनाव मशीनरी के घोर दुरुपयोग के माध्यम से किये गये अपहरण की कड़ी निंदा की है।
श्री खैरा ने कहा कि तथाकथित चुनाव कुछ नहीं, बल्कि एक सोची-समझी धोखाधड़ी थी, जिसकी शुरुआत विपक्षी उम्मीदवारों, खासकर कांग्रेस के उम्मीदवारों के नामांकन पत्रों को बड़े पैमाने पर खारिज करने से हुई। चुनाव अधिकारियों पर खुलेआम दबाव डाला गया, उन्हें डराया-धमकाया गया और सत्तारूढ़ पार्टी के राजनीतिक एजेंट के रूप में काम करने के लिए मजबूर किया गया, जिससे मतदान होने से पहले ही निष्पक्ष माहौल खत्म हो गया। उन्होंने कहा कि विपक्षी समर्थकों को वोट देने से रोकने के लिए आधिकारिक मतदाता सूची से मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर और चुनिंदा तरीके से हटाये गये। श्री खैरा ने कहा, " हजारों असली मतदाताओं के नाम जानबूझकर बिना किसी नोटिस, स्पष्टीकरण या कानूनी प्रक्रिया के हटा दिये गये, जो आपराधिक मतदाता दमन के बराबर है। "उन्होंने कहा कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान भुल्लथ निर्वाचन क्षेत्र के कई कांग्रेस उम्मीदवारों को मनगढ़ंत आपराधिक मामलों में झूठा फंसाया गया। उन्होंने आरोप लगाया, " ये झूठी एफआईआर और पुलिस कार्रवाई जानबूझकर कांग्रेस उम्मीदवारों और उनके समर्थकों को डराने, परेशान करने और चुनाव प्रचार से दूर रखने के लिए की गयी थी। पंजाब पुलिस का खुलेआम राजनीतिक बदले के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया, ताकि डर पैदा किया जा सके और विपक्ष की भागीदारी को दबाया जा सके। "मतगणना प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति जताते हुए, श्री खैरा ने इसे पूरी तरह से दिखावा और लोगों के जनादेश की दिनदहाड़े डकैती करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दलों के विधिवत नियुक्त मतगणना एजेंटों की अनुपस्थिति में मतपत्रों की गिनती की गयी, जो चुनाव नियमों और मानदंडों का सरासर उल्लंघन था। उन्होंने कहा, "जो उम्मीदवार साफ तौर पर जीत गए थे, उन्हें समय पर नतीजों की घोषणा नहीं की गयी, जिन्हें जानबूझकर देर रात तक रोका गया और वोटों में हेरफेर के बाद ही घोषित किया गया।"उन्होंने दावा किया कि वह फर्जी मतगणना के पूरे नाटक के चश्मदीद गवाह थे और नडाला कॉलेज में मतगणना केंद्र के बाहर खड़े थे, जहां वोटों की गिनती की जा रही थी। उन्होंने कहा, " वहां जो हुआ वह गिनती नहीं थी, बल्कि निर्देशों पर काम कर रहे अधिकारियों द्वारा की गयी हेराफेरी थी, विपक्षी एजेंटों को बाहर रखा गया, और पूरी प्रक्रिया एक मज़ाक बनकर रह गयी।"राज्य चुनाव आयोग की भूमिका पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए, श्री खैरा ने कहा कि राज्य चुनाव आयोग पंजाब में लोकतंत्र के संरक्षक के रूप में अपने संवैधानिक कर्तव्य को निभाने में बुरी तरह विफल रहा। उन्होंने कहा, " आयोग ने एक स्वतंत्र प्राधिकरण के बजाय एक मूक सहयोगी के रूप में काम करना चुना। उसकी निष्क्रियता, अनदेखी और मिलीभगत ने चुनावी प्रक्रिया में जनता के विश्वास को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है।" उन्होंने राज्य चुनाव आयुक्त को उनकी घोर अक्षमता, जानबूझकर कर्तव्य की उपेक्षा, और सत्ताधारी आप सरकार के साथ मिलीभगत के लिए तुरंत हटाने की मांग की।
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