बैतूल , अप्रैल 25 -- मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के शाहपुर क्षेत्र में कुपोषण की स्थिति को लेकर प्रशासन ने गंभीर चिंता जताई है। कलेक्टर डॉ. सौरभ संजय सोनवणे के हालिया निरीक्षण में यह सामने आया कि सरकारी योजनाओं और स्वास्थ्य सुविधाओं के बावजूद अपेक्षित संख्या में कुपोषित बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती नहीं कराया जा रहा है। इस पर उन्होंने शनिवार को अधिकारियों को सख्त निर्देश देते हुए कहा कि कुपोषित बच्चों की पहचान कर उन्हें तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया जाए।
निरीक्षण के दौरान सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में कलेक्टर ने एनआरसी की व्यवस्थाओं की समीक्षा की। उन्होंने पाया कि क्षेत्र की जनसंख्या के अनुपात में केंद्र में भर्ती बच्चों की संख्या काफी कम है, जो चिंता का विषय है। इस पर उन्होंने नाराजगी व्यक्त करते हुए स्वास्थ्य अमले को निर्देश दिए कि आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से कुपोषित बच्चों की सक्रिय रूप से पहचान की जाए और उन्हें उपचार के लिए भर्ती किया जाए।
कलेक्टर ने ओपीडी और एनआरसी रजिस्टर का मिलान करते हुए बच्चों के स्वास्थ्य में हो रहे सुधार की भी जानकारी ली। उन्होंने कहा कि सिर्फ कागजी कार्यवाही से काम नहीं चलेगा, बल्कि जमीनी स्तर पर बच्चों के स्वास्थ्य में वास्तविक सुधार दिखना चाहिए। उन्होंने बच्चों का वजन और लंबाई मापकर प्रगति की निगरानी करने के निर्देश भी दिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि कुपोषण से निपटने के लिए सरकार द्वारा कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं, जिनमें पोषण आहार, स्वास्थ्य जांच और विशेष उपचार की व्यवस्था शामिल है। इसके बावजूद यदि बच्चे कुपोषित रह जाते हैं, तो यह संबंधित अधिकारियों की लापरवाही मानी जाएगी।
कलेक्टर ने निर्देश दिए कि गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों को प्राथमिकता के आधार पर एनआरसी में भर्ती किया जाए और उनके परिवारों को भी पोषण संबंधी जागरूकता दी जाए। उन्होंने यह भी कहा कि कुपोषण के मामलों में लापरवाही बरतने वाले कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
प्रशासन ने यह भी तय किया है कि अब नियमित रूप से कुपोषित बच्चों की समीक्षा की जाएगी और हर स्तर पर मॉनिटरिंग को मजबूत किया जाएगा। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे क्षेत्र में भ्रमण कर वास्तविक स्थिति का आकलन करें और जरूरतमंद बच्चों तक योजनाओं का लाभ सुनिश्चित करें।
इस पहल का उद्देश्य जिले में कुपोषण की समस्या को जड़ से खत्म करना है, ताकि बच्चों का स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित किया जा सके।
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