नयी दिल्ली , मार्च 11 -- उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को इस बात पर 'नाराजगी' जतायी कि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने 'कक्षा 8' की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में न्यायिक भ्रष्टाचार से जुड़े विवादास्पद अध्याय को 'विधिवत पुनर्गठित' कर दिया है।
इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने केंद्र-राज्य सरकारों को उस विवादास्पद अध्याय के लेखकों को किसी भी पाठ्यक्रम विकास परियोजना या पाठ्यपुस्तक तैयार करने के कार्य में शामिल करने पर रोक लगा दी है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि अध्याय को पुनर्गठित करने वालों की पहचान उजागर किये बिना ही इसमें बदलाव कर दिये गये। पीठ ने सवाल किया कि विशेषज्ञों के नाम और उनके चयन की प्रक्रिया का खुलासा किये बिना ऐसा संशोधन कैसे किया जा सकता है।
पीठ ने निर्देश दिया कि इस तरह की संवेदनशील सामग्री का कोई भी संशोधन केवल विषय विशेषज्ञों की समिति की समीक्षा के बाद ही किया जाना चाहिए। अदालत ने केंद्र सरकार को संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों का एक पैनल गठित करने का आदेश दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक इस विशेषज्ञ समिति की मंजूरी नहीं मिल जाती, तब तक इस अध्याय को प्रकाशित या पाठ्यपुस्तकों में शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
अदालत ने उन व्यक्तियों के नामों का भी संज्ञान लिया जो पिछले अध्याय को तैयार करने से जुड़े थे। अदालत ने टिप्पणी की कि पुस्तक की सामग्री या तो न्यायपालिका के बारे में अपर्याप्त जानकारी का परिणाम है या फिर युवा छात्रों के मन में नकारात्मक धारणा बनाने और संस्था की छवि खराब करने का जानबूझकर किया गया प्रयास है।
पीठ ने इन चिंताओं के मद्देनजर केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों और सार्वजनिक संस्थानों को यह निर्देश दिया कि वे मूल अध्याय के लेखकों को सार्वजनिक संसाधनों से वित्तपोषित किसी भी पाठ्यक्रम विकास परियोजना या पाठ्यपुस्तक तैयार करने के कार्य में शामिल न करें।
न्यायालय ने केंद्र सरकार से कहा कि वह 'राष्ट्रीय पाठ्यक्रम एवं शिक्षण-शिक्षण सामग्री समिति' के कामकाज और संरचना की फिर से समीक्षा करे, ताकि स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल किये जाने से पहले शैक्षिक सामग्री की उचित सटीक जांच सुनिश्चित की जा सके। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके निर्देशों का उद्देश्य 'न्यायपालिका के संस्थागत कामकाज की किसी भी स्वस्थ और वैध आलोचना को रोकना नहीं है'।
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