ऋषिकेश , जनवरी 21 -- केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने बुधवार को उत्तराखंड के ऋषिकेश में स्थित गीता भवन में गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित 'कल्याण' पत्रिका के शताब्दी वर्ष समारोह में कहा कि समाज में कभी सज्जनों की कमी नहीं होती, कमी होती है उनके संगठित होने की। उन्होंने कहा कि 'कल्याण' पत्रिका ने पिछले 100 वर्षों में सनातन धर्म के अनुयायियों की विचार-शक्ति और सांस्कृतिक चेतना को संगठित करने का कार्य किया है।

श्री शाह ने कहा कि 'कल्याण' ने हर संकट में भारतीय संस्कृति के दीप को जलाए रखा है, चाहे वह अंग्रेज़ों का समय हो या भारत की नई शुरुआत का दौर। उन्होंने कहा कि यह केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि भारतीयों के लिए आध्यात्मिक जगत का पथप्रदर्शक है। भारतीय संस्कृति को अमर करने के लिए अनेक प्रयास चल रहे हैं, जिनमें यह एक अत्यंत सशक्त प्रयास है।

केंद्रीय मंत्री ने मंच से अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए कहा कि मैं बहुत छोटा था, जब मेरी दादी चल बसीं। मगर अपनी बहनों से मैंने सुना है कि मेरी दादी गीता प्रेस से मुद्रित गीता पढ़ती थीं। मेरी माँ भी गीता प्रेस से मुद्रित गीता पढ़ती थीं और आज मेरी पोती अपने स्कूल बैग में हनुमान चालीसा रखकर जा रही है, वह भी गीता प्रेस की है। उन्होंने कहा कि गीता प्रेस का मासिक पत्र 'कल्याण' बीते 100 वर्षों से सनातन संस्कृति और भारतीय ज्ञान को देशवासियों तक निरंतर पहुँचा रहा है।

श्री शाह ने कहा कि भारत का हर वह व्यक्ति जिसे सनातन धर्म से आकांक्षा है, दुनिया का हर वह व्यक्ति जो भारतीय संस्कृति की ओर और दुनिया की समस्याओं के समाधान की ओर देखता है और हर वह व्यक्ति जो इस भूमि को प्यार करता है, वह गीता प्रेस से अनजान हो ही नहीं सकता। उन्होंने कहा कि गीता प्रेस ने अपनी एक ऐसी जगह बनाई है। उन्होंने कहा कि गीता प्रेस मुनाफ़े के लिए नहीं, पीढ़ियों के निर्माण के लिए चलता है। मुनाफ़े के लिए नहीं चलने वाला यह प्रेस आज भी स्वावलंबी तरीके से सद्साहित्य को करोड़ों लोगों तक पहुँचाने का कार्य कर रहा है।

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि श्रद्धेय सेठ श्री जयदयाल जी और पूज्य भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने गीता प्रेस के माध्यम से सनातन धर्म को सशक्त करने का कार्य किया है। उन्होंने भक्ति के माध्यम से करोड़ों लोगों को अध्यात्म की ओर प्रेरित किया और अध्यात्म के रास्ते पर चलते हुए मोक्ष तक का रास्ता प्रशस्त करने का मार्ग बता दिया।

उन्होंने कहा कि गीता प्रेस ने श्रीमद्भागवत, भगवद्गीता, शिवपुराण, विष्णुपुराण, महाभारत, रामचरितमानस, वाल्मीकि रामायण जैसे लोकप्रिय ग्रंथों को बार-बार पुनर्मुद्रित कर लोगों तक पहुंचाया है। लेकिन इसके साथ-साथ आदि शंकराचार्य के उपनिषदों की मीमांसा एवं उनके टीकाग्रंथों को भी लोगों तक पहुंचाकर गीता प्रेस ने बहुत बड़ा कार्य किया है।

श्री शाह ने कहा कि चार-चार पीढ़ियों को सनातन के रास्ते पर आगे बढ़ाने के लिए हर पीढ़ी को वही साहित्य, जरा भी फेरबदल किए बिना, लोकभोग्य बनाने का काम गीता प्रेस ने किया है। उन्होंने कहा कि भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार ने सब कुछ छोड़कर अपना पूरा जीवन गीता प्रेस को समर्पित कर दिया। गोरखपुर आकर उन्होंने कई ग्रंथों की मूल पांडुलिपियां ढूंढ़कर प्रकाशित करने का काम किया। रात के 4-4 बजे तक वे दीये की प्रकाश में प्रूफरीडिंग किया करते थे।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आज़ादी के बाद 'कल्याण' का सबसे पहला अंक जो प्रकाशित हुआ, वह 'नारी अंक' था। सनातन धर्म के अलावा किस धर्म में नारी का महिमामंडन इतने अच्छे तरीके से किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि हिंदू संस्कृति अंक उस समय आया, जब जवाहर लाल नेहरू जी के समय में भारत की नीतियाँ पाश्चात्य प्रभाव से गढ़ी जा रही थीं। रक्षा नीति, शिक्षा नीति, व्यापार नीति और विधि नीति जब पाश्चात्य प्रभाव में बनाई जा रही थीं, तब कल्याण ने चुपचाप हिंदू संस्कृति अंक निकाला।

श्री शाह ने कहा कि जब देश आजाद हुआ था, उस समय गीता प्रेस का यह स्पष्ट विचार रहा होगा कि जब देश आज़ाद होकर अपनी नीतियाँ बना रहा है, तो उनका आधार भारतीय मूल विचार होने चाहिए, न कि पाश्चात्य दृष्टिकोण। ईश्वर की कृपा है कि आज शताब्दी वर्ष में देश की नीतियों में वही वैचारिक 'यू-टर्न' मोदी जी के नेतृत्व में तीव्र गति से साकार हो रहा है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि हाथ से लिखने से लेकर टाइपराइटर और आज की लिथो प्रेस तक की पूरी यात्रा गीता प्रेस और 'कल्याण' ने देखी है। शायद ही कोई मुद्रण संस्था होगी जिसने हाथ से लेकर आज चार रंगों में छपने वाली प्रेस तक का सफर गीता प्रेस की तरह किया हो।

उन्होंने कहा कि बीते इन 11 वर्षों में 550 वर्षों के संघर्ष के बाद रामलला की जन्मभूमि पर गगनचुंबी मंदिर बना है। औरंगज़ेब का तोड़ा हुआ काशी विश्वनाथ कॉरिडोर आज दुनिया को यह संदेश देता है कि तोड़ने वालों से श्रद्धा की ताकत कहीं अधिक बड़ी होती है। आज पूरा भारत पूरे वर्ष 'सोमनाथ स्वाभिमान वर्ष'मना रहा है।

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