देहरादून , अप्रैल 07 -- उत्तराखंड के देहरादून में चल रहे "दून बुक फेस्टिवल 2026" में मंगलवार को विश्व प्रसिद्ध दार्शनिक व लेखक आचार्य प्रशांत का संवाद सत्र सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र रहा। साहित्यिक आयोजनों के बीच उनका वक्तव्य विचारों की गहराई के कारण भी सबसे अलग और प्रभावशाली साबित हुआ।
रिमझिम बारिश के बावजूद बड़ी संख्या में लोग घंटों तक उनके सत्र में बने रहे, जो यह दर्शाता है कि पुस्तकों के साथ साथ जीवन को समझने का दृष्टिकोण दृष्टिकोण भी होना चाहिए।
प्रख्यात लेखिका अद्वैता काला के साथ संवाद सत्र में आचार्य प्रशांत ने सत्य और भ्रम के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि सच कड़वा नहीं होता। जिसे सच की जरूरत होती है, उसके लिए वही सबसे अधिक आवश्यक और अंततः मीठा होता है। उन्होंने ''मेरा सच'' जैसी प्रचलित धारणाओं को चुनौती देते हुए कहा कि यह सोच ही भ्रम की जड़ है। जो सच आसानी से पकड़ में आ जाए, वह पूर्ण सत्य नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि आज व्यक्ति अपने ही बनाए मानसिक ढांचे में कैद है। बचपन से ही समाज और परिवार द्वारा मन में कई झूठी मान्यताएं बैठा दी जाती हैं, जिन्हें व्यक्ति बिना जांचे-परखे सच मान लेता है। हमें बार-बार बताया जाता है कि ऐसा तो होता ही है। दुनिया ऐसी ही है। यही बातें हमारी सोच को सीमित कर देती हैं और हमें वास्तविकता से दूर ले जाती हैं।
आचार्य प्रशांत ने स्पष्ट किया कि डर, झूठ, किस्से-कहानियां और मान्यताएं ये सब मन की उपज हैं, लेकिन व्यक्ति इन्हें वास्तविकता मानकर जीवन जीने लगता है। उन्होंने कहा कि आध्यात्म का अर्थ किसी रहस्यमय प्रक्रिया में जाना नहीं, बल्कि इन भ्रमों को पहचानकर उनसे मुक्त होना है।
संवाद सत्र में कई साधकों ने पारिवारिक रिश्तों, जलवायु परिवर्तन, युवा वर्ग में नशे की बढ़ती प्रवृति, जीवन में आ रही कठिनाइयों समेत कई सवाल किए जिनका आचार्य प्रशांत ने भगवद्गीता के श्लोकों को उद्धृत करते हुए उत्तर दिए।
संवाद सत्र के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए आचार्य प्रशांत ने वर्तमान समय की राजनीति , कैरियर, महिला सशक्तिकरण युवाओं को जीवन में असफलता को लेकर भी स्पष्ट व्याख्या की। उन्होंने कहा कि हम हारेंगे, बार-बार हारेंगे, लेकिन कोई भी हार आखिरी नहीं होनी चाहिए। असफलता से बचने की कोशिश करने के बजाय उसे समझना अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि वही यह दिखाती है कि व्यक्ति कहाँ भ्रम में जी रहा है। उन्होंने कहा कि हार को अंत मान लेना ही सबसे बड़ी भूल है, जबकि वास्तव में वह सुधार का अवसर होती है। पहचान और आत्म-आलोचना से जुड़े एक प्रश्न पर आचार्य प्रशांत ने कहा कि आत्मज्ञान के अभाव में व्यक्ति अपनी पहचान के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाता है। उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति स्वयं को नहीं समझता, तब तक वह दूसरों द्वारा दी गई पहचान में ही जीता रहता है।
शैक्षणिक दबाव और परीक्षा परिणामों को लेकर उन्होंने कहा कि व्यक्ति का नियंत्रण केवल अपने प्रयास, नीयत और ईमानदारी पर होता है, परिणामों पर नहीं। उन्होंने भगवद्गीता के सिद्धांत ''मा फलेषु कदाचन'' का उल्लेख करते हुए कहा कि अच्छे अभिभावक और शिक्षक वही हैं, जो बच्चों से ईमानदारी और प्रेम की अपेक्षा रखें, न कि निश्चित परिणामों की।
आचार्य प्रशान्त ने छात्राओं को पढ़ाई को बोझ न मानने और उससे जुड़ाव विकसित करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि मस्तिष्क वही याद रखता है, जिसे हम महत्व देते हैं। इसलिए पढ़ाई को मजबूरी नहीं, समझने की प्रक्रिया बनाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आध्यात्म को अलग विषय मानना ही सबसे बड़ी भूल है। उनके अनुसार, यह शिक्षा का अभिन्न हिस्सा है।
उन्होंने ''विद्या'' और ''अविद्या'' के संतुलन को पूर्ण शिक्षा बताया, जिसमें बाहरी ज्ञान के साथ-साथ स्वयं को जानने की प्रक्रिया भी शामिल होती है, वर्तमान शिक्षा व्यवस्था व्यक्ति को जानकारी तो देती है, लेकिन उसे यह नहीं सिखाती कि वह स्वयं को कैसे समझे ''जब तक व्यक्ति खुद को नहीं समझेगा, तब तक कोई भी उपलब्धि उसे संतोष नहीं दे सकती।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एआई के बढ़ते प्रभाव पर आचार्य प्रशांत ने संतुलित दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि तकनीक स्वयं समस्या नहीं है। तकनीक न तो अच्छी होती है, न बुरी। उसका स्वरूप इस पर निर्भर करता है कि उसका उपयोग करने वाला व्यक्ति कैसा है। उन्होंने चेताया कि यदि उपयोगकर्ता अचेत और अज्ञान है, तो तकनीक का दुरुपयोग होना तय है, जो समाज और पर्यावरण दोनों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, सजग और जिम्मेदार उपयोग से यही तकनीक मानवता के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
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