नयी दिल्ली , फरवरी 04 -- उच्चतम न्यायालय ने प्राथमिक विद्यालय के अनुदेशकों/शिक्षकों को एक दशक से अधिक समय तक मात्र 7,000 रुपये महीने के मानदेय पर रखने और उनसे एक प्रकार की 'बेगारी' कराने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को बुधवार को कड़ी फटकार लगाई।
न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि उच्च प्राथमिक विद्यालयों में नियुक्त ऐसे सभी अंशकालिक संविदा अनुदेशकों/शिक्षकों को वित्तीय वर्ष 2017-18 से 17,000 रुपये प्रति माह की दर से मानदेय का भुगतान किया जाए और छह महीने के भीतर बकाया राशि का निपटान किया जाए।
अदालत ने कहा कि 2013 में 11 महीने की संविदा अवधि के लिए निर्धारित किया गया मानदेय वर्षों तक स्थिर नहीं रह सकता था और इसमें समय-समय पर संशोधन किया जाना आवश्यक था।
पीठ ने 2017-18 के लिए प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड (पीएबी) के निर्णय का संज्ञान लेते हुए कहा, "चूंकि वर्ष 2017-18 के लिए पीएबी ने मानदेय 17,000 रुपये प्रति माह निर्धारित किया था, इसलिए योजना के तहत नियुक्त सभी अनुदेशक/शिक्षक अगले संशोधन तक 2017-18 से इसी दर पर भुगतान के हकदार हैं।"यह विवाद उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2013 में जारी एक शासनादेश से शुरू हुआ था, जिसमें सर्व शिक्षा अभियान (जो बाद में 2018 में समग्र शिक्षा योजना में समाहित हो गया) के तहत शारीरिक शिक्षा, कला शिक्षा और कार्य शिक्षा के लिए शिक्षकों को 7,000 रुपये के निश्चित मानदेय पर 11 महीने के अनुबंध पर नियुक्त किया गया था, जिसे प्रतिवर्ष नवीनीकृत किया जाना था।
मानदेय बढ़ाने की बार-बार की सिफारिशों और अनुमोदनों के बावजूद, शिक्षकों को मामूली राशि मिलती रही। पीएबी की 2017-18 की सिफारिश के बाद मानदेय को 17,000 रुपये प्रति माह किया गया था, लेकिन 2019-20 के बाद से मानदेय को फिर से घटाकर 7,000 रुपये प्रति माह कर दिया गया था।
सुनवाई के दौरान, उत्तर प्रदेश सरकार ने केंद्र से फंड की कमी का हवाला देते हुए भुगतान न करने को सही ठहराने की कोशिश की। उसने तर्क दिया कि समग्र शिक्षा योजना के तहत खर्च केंद्र और राज्य के बीच 60:40 के अनुपात में साझा किया जाता है, और केंद्र सरकार के योगदान के अभाव में राज्य को पूरा वित्तीय बोझ उठाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि अंतर-सरकारी फंडिंग व्यवस्था शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 7(5) के तहत वैधानिक आदेश को प्रभावित नहीं कर सकती है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि मानदेय का भुगतान करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। न्यायालय ने टिप्पणी की, "अनुदेशकों/शिक्षकों को मानदेय देने का प्रारंभिक बोझ राज्य सरकार पर है, जो 'भुगतान करें और वसूलें' के सिद्धांत पर भारत सरकार से केंद्र सरकार का योगदान वसूलने के लिए स्वतंत्र है।"न्यायालय ने कहा कि सरकारों के बीच वित्तीय विवाद आंतरिक प्रशासनिक मामला है और इसका उपयोग शिक्षकों के वैध बकाया से इनकार करने या बच्चों के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार से समझौता करने के लिए नहीं किया जा सकता है।
पीठ ने अपने निष्कर्षों का सार प्रस्तुत करते हुए कहा, "एक बार जब प्रारंभिक 11 महीने की संविदा अवधि समाप्त हो गई और अनुदेशक निर्बाध रूप से कार्य करते रहे, तो उनकी नियुक्तियां पूरी तरह से संविदात्मक नहीं रहीं।" अनुदेशकों को अंशकालिक कर्मचारियों के रूप में नहीं माना जा सकता, क्योंकि उन्हें स्पष्ट रूप से कोई अन्य रोजगार लेने से प्रतिबंधित किया गया था।
न्यायालय ने कहा कि पीएबी द्वारा 2017-18 के लिए 17,000 रुपये प्रति माह स्वीकृत करने के बाद, किसी भी प्राधिकरण के लिए 8,470 रुपये, 9,800 रुपये या 7,000 रुपये प्रति माह सहित कम राशि का भुगतान करना उचित नहीं था। मानदेय स्थिर नहीं रह सकता और इसमें समय-समय पर, कम से कम हर तीन साल में एक बार संशोधन किया जाना चाहिए।
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