नयी दिल्ली , मार्च 17 -- वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सकल घरेलू उत्पाद की नई श्रृंखला के आंकड़ों के बाद अर्थव्यवस्था की आज की स्थिति की तुलना में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के समय की स्थिति को बेहतर बनाने वाले अर्थ शस्त्रियों की राय को खारिज किया है और कहा है कि आज वास्तव में स्थिति तथाकथित सुनहरे दिनों की तुलना में बेहतर है।
उन्होंने संप्रग समय के बजट के घाटे के आंकड़ों को अपारदर्शी बताते हुए कहा कि बहुत सारे बजट में नहीं दिखाए गए थे और उनका भुगतान मोदी सरकार को अब तक करना पड़ा है।
श्रीमती सीतारमण ने वर्ष 2025 26 की अनुपूरक अनुदान मांगों और उससे संबंधित विनियोग विधेयक 2026 पर राज्यसभा में चर्चा का जवाब देते हुए मंगलवार को कहा,"वास्तविकता यह है कि आज की अर्थव्यवस्था अतीत के तथाकथित "सुनहरे" दौर की तुलना में कहीं अधिक पारदर्शी और मजबूत है, जो बजट से बाहर लेखांकन प्रथाओं पर आधारित था।"उन्होंने कहा कि मोदी सरकार में हम ऐसी प्रथाओं का सहारा नहीं लेते हैं। हमारा बजट पारदर्शी है और वास्तविक राजकोषीय स्थिति को दर्शाता है। इसलिए, आज हम जो विकास के आंकड़े प्रस्तुत करते हैं, वे विश्वसनीय हैं।
वित्त मंत्री ने कहा कि मैं यह भी बताना चाहूंगी कि 2014 में हमें तेल बांड से संबंधित 1.34 लाख करोड़ रुपए की देनदारियां विरासत में मिलीं, जिन्हें बजट से बाहर रखा गया था। 2007-08 से, इन बांडों पर कुल ब्याज लगभग 1.7 लाख करोड़ रहा है। मार्च 2026 तक हमारी सरकार ने तेल बांड की पूरी देनदारी - 2.92 लाख करोड़ रुपए, जिसमें मूलधन और ब्याज दोनों शामिल हैं - का पूर्ण भुगतान कर दिया है।
उस दौर में संप्रग सरकार के बड़े पैमाने पर किए गए गुप्त उधार कार्यक्रमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इनमें से कई उधार अब हम चुका रहे हैं। मुद्दा यह है कि ये उधार उस समय के बजट में शामिल नहीं किए गए थे।
उन्होंने कहा कि यदि इन देनदारियों को बजट में पारदर्शी रूप से शामिल किया जाता, तो राजकोषीय घाटे के आंकड़े बिल्कुल अलग होते। परिणामस्वरूप, विकास के अनुमान और वास्तविक विकास के आंकड़े भी उतने मजबूत नहीं दिखते जितने दिखाए गए थे, बशर्ते बजट लेखांकन पारदर्शी होता।
मंत्री ने कहा कि उस समय के कई उधार बजट से बाहर के थे। यदि इन्हें कहीं और रखने के बजाय बजट में शामिल किया जाता, तो स्थिति बिल्कुल अलग होती।
उन्होंने कहा ,"2004-05 और 2009-10 के बीच, संप्रग सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर नकद सब्सिडी के बदले तेल विपणन कंपनियों को 1.48 लाख करोड़ रुपए के तेल बांड जारी किए। इन्हें बजट में शामिल नहीं किया गया और इन्हें बजट से बाहर के उधार के रूप में माना गया। इन बांडों पर ब्याज दरें सात प्रतिशत से 8.4 प्रतिशत के बीच थीं।
परिणामस्वरूप, उन वर्षों के दौरान राजकोषीय घाटा आधिकारिक रूप से रिपोर्ट किए गए घाटे से काफी अधिक होता। उदाहरण के लिए, 2008-09 में, राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 6.1 प्रतिशत दिखाया गया था। हालांकि, अगर तेल बांड, भारतीय खाद्य निगम की देनदारियां और उर्वरक बांड जैसे बजट से बाहर के उधारों को शामिल किया जाता, तो राजकोषीय घाटा लगभग 7.9 प्रतिशतऔर राजस्व घाटा रिपोर्ट किए गए 4.6 प्रतिशत के बजाय 6.3 प्रतिशत होता।
श्रीमती सीतारमण ने कहा,"उस समय जो तस्वीर पेश की गई थी, वह असलियत से कहीं ज़्यादा अनुकूल प्रतीत होती थी, क्योंकि काफ़ी उधार बजट से बाहर रखे गए थे। सोचिए, अगर यह राशि पिछली देनदारियों को चुकाने में खर्च न होती, तो इसे भारत के भविष्य के निर्माण में निवेश किया जा सकता था - बंदरगाहों, सड़कों, अस्पतालों और स्कूलों में निवेश किया जा सकता था।"उन्होंने कहा कि राजकोषीय विरासत को सुधारने में लागत आई है, लेकिन यह आवश्यक था। सीतारमन ने कहा," हम न केवल वर्तमान अर्थव्यवस्था का प्रबंधन कर रहे हैं, बल्कि पिछली देनदारियों का भी निपटारा कर रहे हैं।"वित्त मंत्री ने कहा कि कोविड काल के दौरान, हमारा राजकोषीय घाटा नौ प्रतिशत से ऊपर चला गया था। लेकिन प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन में, हमने पांच वर्षों के भीतर इसे घटाकर 4.4 प्रतिशत कर दिया है।
इसके विपरीत, पहले के घाटे को कम करके दिखाया गया था क्योंकि देनदारियों को बजट से बाहर रखा गया था और बोझ भावी सरकारों पर डाल दिया गया था।
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