नयी दिल्ली , दिसंबर 18 -- उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश मनमोहन ने गुरुवार को कहा कि नयी श्रम संहितायें श्रम बाजार में लचीलापन बढ़ाने और श्रमिकों का संरक्षण एवं संतुलन बनाने का प्रयास करती हैं।
न्यायमूर्ति मनमोहन ने यहां 'डिकोडिंग द कोड ऑफ फोर लेबर कोड' विषय पर आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि इन श्रम संहिताओं को लागू करने का उद्देश्य व्यापार में सुगमता को बढ़ावा देना है।
कार्यक्रम के विशिष्ठ अतिथि विधि मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव डॉ मनोज कुमार ने कहा कि जिस तरह यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी ने समय के साथ अपने श्रम अधिकारों को लेकर अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किये, इसी तरह हर देश की अपनी अलग परिस्थितियां और चुनौतियां होती हैं। उन्होंने कहा, " हमारे देश में श्रम संहिताओं में ये सुधार आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और संवैधानिक शासन के संगम पर स्थित है। श्रम कानून केवल रोजगार सम्बन्धों को नियंत्रित करने वाले नियमों का समूह नहीं है, बल्कि ये राष्ट्र की नैतिक-आर्थिक संरचना है। कोई भी राष्ट्र तब तक विकसित नहीं हो सकता, जब तक उसका कार्यबल सुरक्षित, कुशल उत्पादक और संरक्षित न हो। "सोसायटी ऑफ इंडियन लॉ फर्म्स की ओर आयोजित इस कार्यक्रम में इसके संस्थापक डॉ ललित भसीन ने इस अवसर पर कहा कि ये संहितायें सतत आर्थिक विकास और श्रमिकों की सुरक्षा के लिये एक बहुत संतुलित दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती हैं। उन्होंने कहा कि इसके लिये एक सहयोगात्मक वातावरण की आवश्यकता है। आत्मनिर्भर भारत की दिशा में सरकार ने एक अहम् कदम उठाते हुए 29 साल पुराने श्रम कानूनों में बदलाव किया है। इन नयी श्रम संहिताओं में मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, व्यावसायिक सुरक्षा और औद्योगिक सम्बन्धों को शामिल किया गया है।
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