बेंगलुरु , जनवरी 27 -- कर्नाटक के बेंगलुरु में केंद्र सरकार द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) का नाम बदलने के फैसले के खिलाफ राजनीतिक एकजुटता का प्रदर्शन होना था लेकिन यह कार्यक्रम इसके बजाय राज्य कांग्रेस के अंदरूनी उथल-पुथल का जीवंत प्रदर्शन बन गया।
विशाल राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन के दौरान मंगलवार को अनुभवी राजनीतिक रणनीतिकार और प्रशासक मुख्यमंत्री सिद्दारमैया को विपक्ष के बजाय अपनी ही पार्टी के लोगों की एक अप्रत्याशित सार्वजनिक चुनौती का सामना करना पड़ा। जैसे ही श्री सिद्धारमैया मंच की ओर बढ़े, भीड़ का ध्यान अचानक भटक गया और भीड़ ने 'डीके-डीके' 'उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ज़िंदाबाद के नारे लगाने शुरू कर दिये।"उपमुख्यमंत्री शिवकुमार के साथ स्पष्ट रूप से जुड़े लोगों के एक वर्ग ने मुख्यमंत्री की बात सुनने से इनकार कर दिया और शोर इतना बढ़ गया कि श्री सिद्दारमैया को अपना संबोधन बीच में ही रोकना पड़ा, जहां व्यवस्था बनाने की कोशिश के दौरान उनकी झुंझलाहट साफ दिखाई दे रही थी।
केंद्र की नीति के खिलाफ एकजुट मोर्चा दिखाने के लिए मौजूद पार्टी के वरिष्ठ नेता साफ तौर पर असहज दिखे। जो रैली एक कल्याणकारी योजना का नाम बदलने के खिलाफ थी, वह कांग्रेस पार्टी के अंदरूनी कलह को उजागर कर गयी।
श्री शिवकुमार को लंबे समय से राज्य में पार्टी के संगठन का मजबूत चेहरा माना जाता है। उनके नाम के ईर्द-गिर्द ही स्थानीय कार्यकर्ता जमा होते हैं।
इसके उलट श्री सिद्धारमैया एक अनुभवी रणनीतिकार और कुशल प्रशासक के रूप में सम्मान रखते हैं। बीते कई महीनों से राजनीतिक विश्लेषक दोनों खेमों के बीच मौजूद सूक्ष्म दरारों की ओर इशारा करते रहे हैं।
हाल के महीनों में रैलियों और कार्यक्रमों में पहले भी 'डीके सीएम' जैसे नारे लग चुके हैं। इससे श्री सिद्दारमैया को चुनौती मिलने की बातें होने लगी थीं। आज की घटना हालांकि महज उसी पैटर्न को जारी रखने वाली नहीं थीं, बल्कि वे पार्टी के भीतर की प्रतिस्पर्धा का सार्वजनिक प्रदर्शन था।
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