अमृतसर , जनवरी 15 -- राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने गुरूवार को कहा कि शिक्षा मात्र आजीविका का साधन नहीं बल्कि यह समाज और राष्ट्र की सेवा का भी एक जरिया है।

सुश्री मुर्मु ने आज यहां गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के 50वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षा केवल रोजगार का साधन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और राष्ट्रीय उन्नति का एक महत्वपूर्ण जरिया भी है। उन्होंने कहा कि जिस समुदाय ने उनका पालन-पोषण किया है, उसके प्रति उनका गहरा दायित्व है, और इस दायित्व को निभाने का एक सार्थक तरीका प्रगति की राह में हाशिए पर पड़े लोगों की मदद करना है। उन्होंने छात्रों को ज्ञान, नवाचार और नैतिक मूल्यों के साथ राष्ट्र की सेवा करने के लिए प्रोत्साहित किया।

सुश्री मुर्मु ने गुरु नानक देव जी की 500वीं जयंती के अवसर पर गुरु नानक देव विश्वविद्यालय की स्थापना पर प्रसन्नता व्यक्त की, जिनके गहन उपदेश और आदर्श इस विश्वविद्यालय के मार्गदर्शक हैं। उन्होंने गुरु नानक देव जी के ज्ञान को हमारी सामूहिक विरासत बताया और कहा कि उनकी अंतर्दृष्टि और सिद्धांत सार्वभौमिक मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि इन्हें अपने दैनिक जीवन में आत्मसात करके हम समाज की अनगिनत समस्याओं का समाधान पा सकते हैं।

राष्ट्रपति ने गुरु नानक देव जी द्वारा जीवन के सभी क्षेत्रों में महिलाओं की समानता के समर्थन को याद किया। उन्होंने इस बात पर विशेष गर्व व्यक्त किया कि जीएनडीयू सक्रिय महिला सशक्तिकरण के माध्यम से इस दृष्टिकोण के साथ जुड़ा हुआ है, जैसा कि समारोह में डिग्री और पुरस्कार प्राप्त करने वाली महिला प्रतिभागियों की मजबूत उपस्थिति से स्पष्ट होता है। उन्होंने जोर दिया कि महिलाओं को अदम्य आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने के लिए सशक्त बनाना सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय जीवंतता के लिए आवश्यक है और सभी से इस कार्य में सहयोग करने का आह्वान किया। उन्होंने शिक्षा में छात्राओं की बढ़ती संख्या पर भी प्रसन्नता व्यक्त की।

राष्ट्रपति ने इस बात पर जोर दिया कि औपचारिक शिक्षा पूरी करने के बाद छात्र विभिन्न रास्तों पर चलेंगे। कुछ सरकारी या निजी क्षेत्रों में योगदान देंगे, कुछ उच्च अध्ययन या अनुसंधान में संलग्न होंगे, जबकि कई शिक्षा के क्षेत्र में अपना उद्यम या करियर शुरू करेंगे। यद्यपि प्रत्येक क्षेत्र के लिए विशिष्ट योग्यताएं और क्षमताएं आवश्यक हैं, फिर भी कुछ शाश्वत गुण सभी क्षेत्रों में सफलता के लिए महत्वपूर्ण और लाभकारी बने रहते हैं। इनमें आजीवन सीखने की अदम्य प्यास और जुनून; चुनौतियों और कठिनाइयों के बीच नैतिक सिद्धांतों, सत्यनिष्ठा और सच्चाई के प्रति अटूट प्रतिबद्धता; परिवर्तन को स्वीकार करने का साहस; असफलताओं से सबक लेकर आगे बढ़ने का संकल्प; सामूहिक प्रयास और साझेदारी के प्रति प्रतिबद्धता; समय और संसाधनों का विवेकपूर्ण प्रबंधन; और विशेषज्ञता और प्रतिभा का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समुदाय और देश के व्यापक कल्याण के लिए करना शामिल है। उन्होंने पुष्टि की कि ये गुण न केवल उन्हें अनुकरणीय पेशेवर बनाएंगे, बल्कि कर्तव्यनिष्ठ नागरिक भी बनाएंगे।

राष्ट्रपति ने पिछले दशक में तकनीकी नवाचार और उद्यमशीलता की भावना में भारत की असाधारण प्रगति पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज कृषि प्रौद्योगिकी से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक, रक्षा से लेकर अंतरिक्ष अन्वेषण तक, स्टार्टअप के अपार अवसर मौजूद हैं, जो युवाओं के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। उन्होंने उच्च शिक्षा संस्थानों से आग्रह किया कि वे अत्याधुनिक अनुसंधान को बढ़ावा देकर, शिक्षा जगत और उद्योग के बीच संबंधों को मजबूत करके और सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करने वाले नवाचारों को प्रोत्साहित करके इस गति को और आगे बढ़ाएं।

राष्ट्रपति ने ज़ोर दिया कि आने वाले दो दशक 'विकसित भारत' के सपने को साकार करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। भारत का भविष्य ऐसे युवाओं पर निर्भर करता है जो वैज्ञानिक जिज्ञासा से ओतप्रोत हों, ज़िम्मेदारी से काम करें और निस्वार्थ सेवा के लिए समर्पित हों। उन्होंने शिक्षण संस्थानों से इन आदर्शों को अपने पाठ्यक्रम और शिक्षा के मूल्यों में गहराई से समाहित करने का आग्रह किया। साथ ही, उन्होंने स्नातक छात्रों को प्रोत्साहित किया कि वे अपने चुने हुए व्यवसायों को इस तरह से चुनें कि उनका हर प्रयास राष्ट्र की शक्ति को बढ़ाए और मानवता के सार को कायम रखे।

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