रोम , दिसंबर 28 -- संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की नवीनतम रिपोर्ट 'द स्टेट ऑफ़ फ़ूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड' के अनुसार, 2024 में वैश्विक स्तर पर भूख का सामना करने वाले लोगों की संख्या में 0.3 प्रतिशत की मामूली गिरावट आई है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल दुनिया की लगभग 8.2 प्रतिशत आबादी (करीब 67.3 करोड़ लोग) भुखमरी का शिकार थी, जो 2022 और 2023 के आंकड़ों की तुलना में कम है। हालांकि, यह सुधार पूरी दुनिया में एक समान नहीं रहा है। जहाँ दक्षिण अमेरिका और दक्षिण-पूर्वी एशिया में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, वहीं अफ्रीका और पश्चिमी एशिया के कई हिस्सों में हालात पहले से ज्यादा गंभीर हो गए हैं।

एफएओ के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो के अनुसार, अफ्रीका में स्थिति लगातार चिंताजनक बनी हुई है। 2024 में इस महाद्वीप की लगभग 20.2 प्रतिशत आबादी (30.7 करोड़ लोग) कुपोषित थी। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि वर्तमान रुझान नहीं बदला, तो 2030 तक अफ्रीका में कुपोषित लोगों की संख्या बढ़कर 51.2 करोड़ हो जाएगी, जो दुनिया के कुल कुपोषितों का 60 प्रतिशत होगा। इस संकट के पीछे जनसंख्या का अत्यधिक दबाव, कृषि उत्पादन में कमी, सैन्य संघर्ष, जलवायु परिवर्तन और खाद्य आयात पर बढ़ती निर्भरता जैसे प्रमुख कारण जिम्मेदार हैं। वैश्विक बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव से ये क्षेत्र सीधे प्रभावित होते हैं, जिससे गरीब जनता के लिए बुनियादी भोजन जुटाना भी मुश्किल हो जाता है।

इसके विपरीत, दक्षिण अमेरिका ने भुखमरी से लड़ने में एक सफल मिसाल पेश की है। ब्राज़ील और मेक्सिको जैसे देशों ने व्यापक सामाजिक कार्यक्रम शुरू किए हैं, जो वंचितों को सीधी आर्थिक मदद देने के साथ-साथ स्कूलों में पोषण सुनिश्चित कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, इन देशों ने कृषि उत्पादन और तकनीक में भारी निवेश किया है। ब्राज़ील, उरुग्वे और पैराग्वे आज अनाज के प्रमुख वैश्विक निर्यातक बन चुके हैं, जबकि चिली और पेरू जैसे देशों ने उच्च मूल्य वाली खाद्य वस्तुओं के उत्पादन में महारत हासिल की है। इस निवेश और बेहतर वितरण प्रणाली के कारण न केवल स्थानीय बाजार में भोजन की उपलब्धता बढ़ी है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इन देशों की स्थिति मजबूत हुई है।

श्री टोरेरो ने आंकड़ों पर टिप्पणी करते हुए एक साक्षात्कार में कहा कि यह रिपोर्ट 'सावधानी भरी' उम्मीद जगाती है। इसकी वजह है कि दुनिया में लगातार दूसरे साल वैश्विक भूख में कमी आई है। साल 2024 में लगभग 67.3 करोड़ लोग भूख का सामना कर रहे थे, जो 2023 के 8.5 प्रतिशत और 2022 के 8.7 प्रतिशत से कम है। यह प्रगति दक्षिणी और दक्षिण-पूर्वी एशिया, साथ ही दक्षिण अमेरिका में उल्लेखनीय सुधारों के कारण हुई है। उन्होंने कहा, "लेकिन यह वैश्विक प्रवृत्ति क्षेत्रीय असमानताओं को छिपाती है। अफ्रीका के ज़्यादातर उप-क्षेत्रों और पश्चिमी एशिया में भूख बढ़ रही है।

उन्होंने कहा कि खाद्य असुरक्षा अभी भी बड़े पैमाने पर फैली हुई है। साल 2024 में लगभग 2.3 अरब लोग यानी दुनिया की आबादी का 28 प्रतिशत मध्यम या गंभीर खाने की कमी का सामना कर रहे थे। दुनिया भर में यह दर कम हो रही है, लेकिन अफ्रीका में बढ़ रही है, जो ज़्यादा लक्षित कार्रवाई की ज़रूरत को दिखाता है।

श्री टोरेरो ने अफ्रीका की बिगड़ती स्थिति पर कहा कि इस क्षेत्र में जनसंख्या का दबाव ज्यादा है, जबकि कृषि से मिलने वाले उत्पाद कम ही हैं। इस क्षेत्र का खाद्य उत्पादन आबादी में हो रही वृद्धि के हिसाब से पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि सैन्य संघर्षों, जलवायु परिवर्तन और बिगड़ती आर्थिक स्थिति भी अफ्रीका में भूख का कारण है।

श्री टोरेरो ने कहा कि कई अफ्रीकी और पश्चिमी एशियाई देश खाने के लिये आयात पर निर्भर हैं, जो बढ़ती भूख का तीसरा कारण हैं। उन्होंने कहा कि ये क्षेत्र दामों में वैश्विक फेरबदल से प्रभावित होते हैं। यही वजह है कि इन देशों में मामूली खाने की चीज़ों की कीमत अदा कर पाना भी लोगों के लिये मुश्किल साबित होता है।

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