जयपुर , जनवरी 31 -- बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के पूर्व निदेशक एवं वरिष्ठ पक्षी-विज्ञानी डॉ. असद रहमानी ने कहा है कि वर्तमान में पूरे देश में आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स) संकट की स्थिति में हैं और इनके संरक्षण के लिए गंभीर प्रयास करने की जरुरत हैं।
डॉ. रहमानी ने ग्रीन पीपल सोसायटी जयपुर चैप्टर द्वारा राजस्थान सरकार के वन विभाग एवं डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया के सहयोग से आयोजित जयपुर बर्ड फेस्टिवल-2026 के तहत शनिवार को यहां कानोता कैंप रिजॉर्ट, जामडोली में एक राज्य स्तरीय कार्यशाला में यह बात कही। उन्होंने अमृत सरोवर योजना की जानकारी देते हुए उसमें मौजूद कुछ विसंगतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया।
राजस्थान वाइल्ड लाइफ बोर्ड के सदस्य एवं एनसीटीए के पूर्व सदस्य राजपाल सिंह ने वेटलैंड्स को हो रही क्षति के कारणों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अतिक्रमण, पानी की कमी और अनियमित पर्यटन गतिविधियां वेटलैंड्स के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही हैं। उन्होंने विशेष रूप से सांभर लेक सहित अन्य वेटलैंड्स पर पर्यटन के दुष्प्रभावों की चर्चा की और संरक्षण के लिए स्पष्ट एसओपी बनाए जाने की आवश्यकता जताई। साथ ही उन्होंने उदयपुर के मेनार, किशन करेरी और बड़वई क्षेत्रों में ग्रामीणों द्वारा किए जा रहे संरक्षण प्रयासों की सराहना की।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया के सीईओ रवि सिंह ने जयपुर बर्ड फेस्टिवल के सफल आयोजन की प्रशंसा करते हुए कहा कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की जरूरत है और बर्ड फेस्टिवल जैसे आयोजन इस दिशा में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने पर्यावरण और संरक्षण विषयों पर छोटे-छोटे प्रबुद्ध समूहों के संवाद को समय की आवश्यकता बताया।
चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन (केसीए) अरुण प्रसाद ने सांभर झील के संदर्भ में बताया कि वहां वन विभाग का कोई प्रत्यक्ष क्षेत्र नहीं है लेकिन पक्षियों की उपस्थिति के कारण यह विभिन्न विभागों के बीच समन्वय का केंद्र बनता है। उन्होंने बीते वर्षों में बर्ड फ्लू की स्थितियों में किए गए संरक्षण प्रयासों की जानकारी दी और पर्यटन प्रबंधन की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यशाला में रेप्टर्स एक्सपर्ट रातुल शाह की पुस्तक "फाल्कन्स आफ इंडिया" का विमोचन भी किया गया। इस अवसर पर पद्मश्री सम्मानित फोटोग्राफर अनूप शाह ने अपनी प्रस्तुति में बताया कि भारत में रेप्टर्स की 108 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 60 से अधिक प्रजातियां राजस्थान में मौजूद हैं। उन्होंने रेप्टर्स की घटती संख्या पर चिंता जताते हुए इनके संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया।
उल्लू विशेषज्ञ डॉ. प्राची मेहता ने उल्लुओं पर आधारित प्रस्तुति देते हुए बताया कि विश्व में आउल की 240 प्रजातियां, जबकि भारत में 36 प्रजातियां पाई जाती हैं। उन्होंने बताया कि आउल अंटार्कटिका को छोड़कर लगभग सभी महाद्वीपों में पाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि अधिकांश प्रजातियों में मादा उल्लू का आकार नर से बड़ा होता है। अपने व्याख्यान में उन्होंने उल्लुओं की जीवन शैली, व्यवहार और पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला।
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