नयी दिल्ली , अप्रैल 10 -- विश्व होम्योपैथी दिवस के मौके पर यहां विज्ञान भवन में शुक्रवार को राष्ट्रीय कार्यक्रम का आयोजन किया। होम्योपैथी के जनक डॉ. सैमुअल हैनिमैन की जयंती पर 'होम्योपैथी फॉर सस्टनेबल हेल्थ' (सतत स्वास्थ्य के लिये होम्योपैथी) थीम पर आयोजित कार्यक्रम में देशभर के नीति-निर्माता, शोधकर्ता, चिकित्सक, शिक्षाविद और छात्र शामिल हुए।
इस कार्यक्रम में कई महत्वपूर्ण प्रकाशन, सीसीआरएच का नया लोगो और डिजिटल पहल भी लॉन्च की गईं।
इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री प्रतापराव जाधव ने अपने संबोधन में कहा कि भारत में होम्योपैथी क्षेत्र लगातार मजबूत हो रहा है और यह शोध, शिक्षा तथा संस्थागत सहयोग के माध्यम से सुलभ व किफायती स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करा रहा है। उन्होंने कहा कि साक्ष्य-आधारित शोध और निरंतर अनुसंधान से ही होम्योपैथी को वैश्विक स्तर पर और मजबूत बनाया जा सकता है।
आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने बताया कि सरकार आयुष क्षेत्र को मजबूत करने के लिए बुनियादी ढांचे, डिजिटल प्लेटफॉर्म और अनुसंधान में निवेश कर रही है। उन्होंने आयुष ग्रिड और एचएमआईएस जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया। आयुष ग्रिड आयुष मंत्रालय द्वारा शुरू की गई एक व्यापक डिजिटल पहल है, जो आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी (आयुष को एक साथ एक डिजिटल मंच पर लाती है।
यह देश के सभी आयुष अस्पतालों, प्रयोगशालाओं और शोध केंद्रों को जोड़कर स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और पारदर्शिता लाने वाला एक आईटी नेटवर्क है। जबकि एचएमआईएस एक एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो आयुष अस्पतालों (आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध, होम्योपैथी) के कामकाज को डिजिटल बनाता हैकार्यक्रम में केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद (सीसीआरएच), राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग (एनसीएच) और राष्ट्रीय होम्योपैथी संस्थान (एनआईएच) की भूमिका को भी रेखांकित किया गया, जो देश में होम्योपैथी के विकास और मानकीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में 3.45 लाख से अधिक पंजीकृत होम्योपैथी चिकित्सक और 291 शैक्षणिक संस्थान हैं, जो इसे एक मुख्यधारा चिकित्सा पद्धति के रूप में स्थापित करते हैं।
इस मौके पर होम्योपैथी के क्षेत्र में शोध, शिक्षा, नैतिक मानकों और डिजिटल एकीकरण को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया। साथ ही, किफायती, समावेशी और टिकाऊ स्वास्थ्य सेवाओं के लिए इस पद्धति की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया।
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