नयी दिल्ली , जनवरी 14 -- राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के भारत मंडपम में चल रहे नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला के पांचवें दिन मेले का माहौल पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय रंग में रंगा नजर आया। अंतरराष्ट्रीय पवैलियन वैश्विक साहित्यिक संवाद, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और बौद्धिक विमर्श का केंद्र बना, जहां फ्रांस, पोलैंड, ऑस्ट्रिया, यूक्रेन और कतर जैसे देशों ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। साहित्य के माध्यम से देशों के बीच संवाद, साझा इतिहास और भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा इस दिन का मुख्य आकर्षण रही।
दिन की शुरुआत अंतरराष्ट्रीय पवैलियन में आयोजित विशेष सत्रों से हुई। भारत में पोलैंड के राजदूत हिज एक्सलेंसी पियोटर स्विटाल्स्की ने साहित्य को देशों के बीच सांस्कृतिक समझ और आपसी संवाद का सबसे मजबूत सेतु बताया। उन्होंने कहा कि भारत और पोलैंड, दोनों देशों ने अपने इतिहास में विभाजन और संघर्ष का दर्द झेला है, लेकिन साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं ने उनकी धर्मनिरपेक्ष पहचान को जीवित रखा। उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर के लेखन का उल्लेख करते हुए कहा कि टैगोर की रचनाएं दोनों देशों के साझा मानवीय और बौद्धिक मूल्यों को जोड़ती हैं।
इसी क्रम में भारत में फ्रांस के राजदूत हिज एक्सलेंसी थिएरी माथू ने "द फ्यूचर ऑफ बुक्स" विषय पर आयोजित सत्र में भाग लिया। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी) के निदेशक युवराज मलिक के साथ संवाद करते हुए उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में भी पुस्तकें अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए हैं, लेकिन पठन की आदतों में बदलाव साफ नजर आता है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सहयोग, अनुवाद और नवाचार को भविष्य के प्रकाशन जगत की अहम कड़ी बताया।
फ्रांस भारत-फ्रांस नवाचार वर्ष 2026 के तहत इस बार पुस्तक मेले के केंद्र में रहा। फ्रेंच पवैलियन का उद्घाटन विशेष आकर्षण रहा, जिसकी संरचना नोत्र-डेम कैथेड्रल की वास्तुकला से प्रेरित थी और जिसमें बांस जैसे टिकाऊ संसाधनों का उपयोग किया गया। यह पवैलियन रचनात्मकता, पर्यावरणीय चेतना और सांस्कृतिक संवाद का प्रतीक बनकर उभरा।
ऑस्ट्रिया और यूक्रेन के सहयोग से आयोजित एक पैनल चर्चा में संघर्ष और अनिश्चितता के दौर में साहित्य की भूमिका पर गहन विमर्श हुआ। ऑस्ट्रियाई लेखक वैलेरी फ्रिट्श और एंड्रियास उंटरवेगर तथा यूक्रेनी लेखक ल्युबोमिर डेरेश ने अपने अनुभव साझा किए। इस सत्र का संचालन मुर्तज़ा अली ख़ान ने किया। कार्यक्रम के दौरान भारत में यूक्रेन के राजदूत हिज एक्सलेंसी डॉ. ओलेक्सांद्र पोलिशचुक को सम्मानित भी किया गया। वक्ताओं ने कहा कि साहित्य न केवल संघर्ष को दर्ज करता है, बल्कि आशा, जिजीविषा और पुनर्निर्माण की भावना को भी जीवित रखता है।
कतर की सांस्कृतिक विरासत पर केंद्रित एक प्रस्तुति में मोहम्मद अल ब्लोशी ने भारत और कतर के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को रेखांकित किया। उन्होंने व्यापार, समुद्री मार्गों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के जरिए दोनों देशों के पुराने रिश्तों को साहित्यिक संदर्भों के साथ सामने रखा।
इस दिन मेले में कई प्रतिष्ठित भारतीय अतिथियों की मौजूदगी भी रही। त्रिपुरा के राज्यपाल एन. इंद्रसेना रेड्डी, नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी, पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल 'निशंक', पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल, माननीय न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर और अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने विभिन्न सत्रों में भाग लिया।
पुस्तक मेला में श्री सत्यार्थी ने करुणा की शक्ति पर आधारित अपने विचार साझा करते हुए अपनी आगामी पुस्तक "करुणा: द पॉवर ऑफ कम्पैशन" और आत्मकथा पर चर्चा की। उन्होंने करुणा गुणांक (सीक्यू) की अवधारणा को सामने रखते हुए कहा कि करुणा केवल भावना नहीं, बल्कि एक सीखने योग्य जीवन कौशल है। उन्होंने युवाओं को अपने "3डी मंत्र"-ड्रीम बिग, डिस्कवर योर पोटेंशियल और डू इट नाउ-के जरिए समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का संदेश दिया।
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