नयी दिल्ली , मार्च 24 -- विश्व क्षय रोग (टीबी) दिवस के अवसर पर भारत ने मंगलवार को अपनी तरह का पहला वैश्विक नैदानिक अध्ययन शुरू किया।

इसका उद्देश्य मानक टीबी उपचार के साथ आयुर्वेद की भूमिका का वैज्ञानिक मूल्यांकन करना है।यह ऐतिहासिक अध्ययन विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत जैव प्रौद्योगिकी विभाग और आयुष मंत्रालय के संयुक्त रूप से शुरू किया गया है। इसका लक्ष्य कठोर वैज्ञानिक सत्यापन के माध्यम से पारंपरिक एंटी-ट्यूबरकुलोसिस थेरेपी (एटीटी) के सहायक के रूप में आयुर्वेद का आकलन करना है।

केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने इसे 'टीबी मुक्त भारत' प्राप्त करने की दिशा में बड़ा कदम बताया। इस पहल को 'आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान' का संगम बताते हुए उन्होंने कहा कि यह एकीकृत और रोगी-केंद्रित दृष्टिकोण टीबी रोगियों के उपचार के परिणामों और उनके जीवन की गुणवत्ता में काफी सुधार कर सकता है। उन्होंने कहा, "तपेदिक का समाधान अलग-थलग रहकर नहीं किया जा सकता। परिणामों को बदलने के लिए 'पूर्ण-विज्ञान' और 'पूर्ण-सरकार' का दृष्टिकोण आवश्यक है।"प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उद्धृत करते हुए डॉ सिंह ने कहा कि यह प्रगति बीमारी के उन्मूलन की दिशा में देश के निरंतर और अभिनव प्रयासों को दर्शाती है। उन्होंने उल्लेख किया कि हालांकि यक्ष्मा अब भी जटिल चुनौतियां पेश कर रहा है, जिनमें दवाओं की विषाक्तता, कुपोषण, रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी और उपचार के बाद भी लंबे समय तक रहने वाली स्वास्थ्य जटिलताएं शामिल हैं। ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी का बढ़ता बोझ नवीन और बहु-विषयक हस्तक्षेपों की आवश्यकता को और अधिक रेखांकित करता है।

शोध प्रयासों पर प्रकाश डालते हुए श्री सिंह ने कहा कि 'रिपोर्ट इंडिया' और 'इंडियन ट्यूबरकुलोसिस जीनोमिक सर्विलांस' (आईएनटीजीएस) कंसोर्टियम जैसी पहलों ने इस बीमारी की वैश्विक समझ में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जिसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देशों को आकार देना भी शामिल है। उन्होंने कहा कि नया शुरू किया गया यह नैदानिक अध्ययन भारत के आठ प्रमुख संस्थानों में टीबी के लगभग 1,250 नये निदान किये गये रोगियों को नामांकित करेगा। यह पोषण स्तर, शरीर के वजन, बीमारी की प्रगति, सुरक्षा और जीवन की समग्र गुणवत्ता जैसे मानकों पर सहायक चिकित्सा के रूप में आयुर्वेद के प्रभाव की जांच करेगा। टीबी से जुड़ी जटिलताओं और रिकवरी पैटर्न का अध्ययन करने के लिए उन्नत वैज्ञानिक उपकरणों का उपयोग किया जायेगा। इनमें इम्यून प्रोफाइलिंग, मेटाबोलोमिक्स, एमआरआई और सिंगल-सेल आरएनए सीक्वेंसिंग शामिल हैं।

डॉ सिंह ने कहा कि तपेदिक के खिलाफ लड़ाई में 'नवाचार, एकीकरण और सामूहिक जिम्मेदारी' की आवश्यकता है। उन्होंने आगे कहा कि ऐसी पहल भारत की टीबी-मुक्त भविष्य की यात्रा को तेज करेगी और आधुनिक विज्ञान के साथ पारंपरिक ज्ञान के संयोजन में एक वैश्विक मानक स्थापित करेगी। यह पहल 'संपूर्ण-राष्ट्र' के प्रयास को दर्शाती है, जो साक्ष्य-आधारित अनुसंधान के माध्यम से पारंपरिक चिकित्सा को प्रमाणित करने के लिए वैज्ञानिकों, चिकित्सकों और संस्थानों को एक साथ लाती है।

आयुष राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने कहा कि यह अध्ययन स्वास्थ्य सेवा के व्यापक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है, जो केवल संक्रमण को ठीक करने से आगे बढ़कर समग्र स्वास्थ्य लाभ सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।

जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव राजेश एस. गोखले ने कहा कि यह कार्यक्रम टीबी अनुसंधान में भारत के व्यापक कार्य पर आधारित है और साक्ष्य-आधारित एकीकृत स्वास्थ्य सेवा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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