बी.डी. नारायणकर सेबेंगलुरु , जनवरी 19 -- कर्नाटक में कांग्रेस के भीतर सियासी तापमान धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। मुख्यमंत्री सिद्दारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बीच बीते कुछ दिनों से प्रभाव और नेतृत्व को लेकर खींचतान तेज हो गई है। पार्टी के अंदरूनी सूत्र इसे तगड़ा नेतृत्व संघर्ष बता रहे हैं।

इस राजनीतिक हलचल की पृष्ठभूमि में 22 जनवरी से शुरू होने वाला सात दिवसीय विशेष विधानसभा सत्र और उसके बाद मार्च में प्रस्तावित अहम बजट सत्र है। दोनों खेमे हाईकमान के अंतिम फैसले से पहले अपनी स्थिति मजबूत करने की रणनीति में जुटे हुए हैं।

उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने 18 जनवरी को अपना दावोस दौरा रद्द कर दिल्ली में डेरा डाल लिया, जहां वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से लगातार मुलाकात कर रहे हैं। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने स्वीकार किया कि वे वहां "राजनीति करने" आए हैं, हालांकि किन नेताओं से मुलाकात हुई, इस पर उन्होंने चुप्पी साधते हुए सिर्फ इतना कहा, "समय ही सभी जवाब देगा।" यह बयान साफ संकेत देता है कि श्री शिवकुमार सक्रिय लॉबिंग कर रहे हैं, लेकिन पूरी सावधानी के साथ अपने पत्ते खुले नहीं छोड़ रहे।

दूसरी ओर, मुख्यमंत्री सिद्दारमैया अपनी राजनीतिक मजबूती को शांत लेकिन ठोस तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं। वे कर्नाटक के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता बन चुके हैं, जिससे उन्होंने दिवंगत देवराज उर्स का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। यह उपलब्धि न केवल प्रतीकात्मक है, बल्कि पार्टी के भीतर उनके नेतृत्व के दावे को और मजबूत करती है। सूत्रों के अनुसार, श्री सिद्दारमैया आने वाले हफ्तों में एक बड़े 'समावेश' (जनसभा) की योजना बना रहे हैं, जिसमें इस उपलब्धि का जश्न मनाने के साथ-साथ पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच अपनी पकड़ और प्रभाव को प्रदर्शित किया जाएगा।

यह संघर्ष केवल राज्य स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके राष्ट्रीय मायने भी हैं। हाईकमान का भरोसा जिस खेमे को मिलेगा, वही आने वाले महीनों में कर्नाटक कांग्रेस की दिशा तय करेगा। फिर चाहे वह पार्टी संगठन हो, मंत्रिमंडलीय जिम्मेदारियां हों या विधानसभा की रणनीति। सार्वजनिक मंचों पर मुस्कान और संयमित बयानों के पीछे राजनीतिक शतरंज की बिसात चुपचाप बिछाई जा रही है।

इस शक्ति संतुलन की पहली झलक 22 से 28 जनवरी तक चलने वाले विशेष विधानसभा सत्र में देखने को मिलेगी। कौन समिति की अध्यक्षता करता है, कौन विधायक बहसों में हावी रहता है और किस खेमे की प्राथमिकताएं एजेंडे में दिखती हैं, ये सभी संकेत अंदरूनी समीकरणों को उजागर करेंगे। बाहर से यह सत्र भले ही सामान्य लगे, लेकिन राजनीतिक गलियारों में हर कदम को संदेश के रूप में देखा जाएगा।

विशेष सत्र के बाद दोनों गुट समर्थन जुटाने और जनसंदेश गढ़ने में जुट जाएंगे। फरवरी का महीना रणनीतिक गतिविधियों का दौर रहने की संभावना है। जहां श्री शिवकुमार गठबंधनों को मजबूत करेंगे, वहीं श्री सिद्दारमैया संगठनात्मक समन्वय और प्रस्तावित समावेश की तैयारियों के जरिए अपनी स्थिति और सुदृढ़ करेंगे।

मार्च में बजट सत्र के दौरान निर्णायक क्षण सामने आ सकता है। नेतृत्व से जुड़े संकेत, संभावित मंत्रिमंडलीय फेरबदल और विकास योजनाओं की घोषणाएं यह दर्शा सकती हैं कि असली सत्ता किसके हाथ में है। श्री सिद्दारमैया के लिए सफल समावेश और विधानसभा कार्यवाही पर प्रभाव उनकी राजनीतिक पकड़ को और पुख्ता कर सकता है।

हालांकि, एक बड़ा सवाल बना हुआ है क्या श्री राहुल गांधी इस सियासी उलझन को सुलझा पाएंगे? छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों के पिछले अनुभव बताते हैं कि ऐसे अंदरूनी विवाद जल्दी सुलझते नहीं हैं और अक्सर महीनों तक सुलगते रहते हैं।

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