नयी दिल्ली , दिसंबर 18 -- ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार देने वाली दो दशक पुरानी महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की जगह लेने वाले "विकसित भारत रोजगार और आजीविका के लिए गारंटी मिशन (ग्रामीण) वीबी -जी राम-जी (विकसित भारत जी राम जी) विधेयक 2025" को लोकसभा ने विपक्षी दलों के कड़े विरोध और भारी हंगामे के बीच गुरुवार को ध्वनिमत से पारित कर दिया।
लोकसभा में वीबी -जी राम-जी विधेयक पर बुधवार देर रात तक करीब नाै घंटे चर्चा चली और सभी दलों के सदस्यों ने इसमें हिस्सा लिया। चर्चा के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बताया कि चर्चा में 98 सदस्यों ने हिस्सा लिया।
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गुरुवार को चर्चा का जवाब दिया जिसके बाद विधेयक को पारित कर दिया गया। श्री चौहान ने कहा कि विधेयक महिला, युवा, गरीबों के जीवन में बदलाव लाने के साथ ही बापू के सपनों और उनके आदर्शों को जिंदा रखने में अहम भूमिका निभाएगा और यह कानून गरीबों की जिंदगी बदलकर आदर्श ग्राम स्थापित करेगा जिसमें लोगों को सभी प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध होंगी।
उन्होंने कहा कि इस विधेयक के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं, युवाओं और गरीबों की जिंदगी में बड़ा बदलावा आएगा और बापू के आदर्शों को जिंदा रखते हुए देश के गांवों का विकास होगा। यह गरीबों की जिंदगी बदलेगा और आदर्श ग्राम की स्थापना करेगा और गांव में ही ग्रामीणों को सभी प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध होने के साथ ही जरूरी सामान्य सुविधाएं उपलब्ध हो सकेंगी।
मनरेगा कानून 2005 में तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के कार्यकाल में बना था और उस सरकार का यह उसके प्रमुख कार्यक्रमों में से एक था। मनरेगा के जरएि ग्रामीण क्षेत्र में हर परिवार को न्यूनतम 100 दिन सालाना रोजगार की कानूनी गारंटी दी गयी। इसकी जगह अब वीबी जी रामजी विधेयक 2025 विधेयक लाया गया जिस पर गुरुवार को लोकसभा की मुहर लग गयी। विधेयक इसे बाद राज्यसभा में पारित होगा और संसद की मुहर लगने के बाद इसे फिर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए भेजा जाएगा और राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद मनरेगा कानून की जगह लेगा।
वीबी जी राम जी विधेयक में 100 के स्थान पर न्यूनतम 125 दिन के रोजगार की गारंटी का प्रस्ताव है। खेती-बाड़ी में श्रमिकों की कमी की समस्या को ध्यान में रखते हुए बुवाई-कटाई के मौसम में वर्ष में 60 दिन तक इस योजना के काम को स्थगित रखा जा सकता है। यह फैसला राज्य सरकारों के हाथ में होगा कि किस समय इसे स्थगित रखना है। इसे केंद्र प्रायोजित योजना बनाया गया है और इसमें केंद्र तथा राज्य का अंशदान रखा गया है। केंद्र तथा राज्य का अंशदान 60:40 के अनुपात में होगा। पूर्वोत्तर और हिमालय क्षेत्र के राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 90 प्रतिशत धन केंद्र देगा। जिन केंद्र शासित प्रदेशों में विधायिका नहीं है वहां पूरा खर्च केंद्र उठाएगा। मनरेगा के तहत अब भी राज्य सरकारें कार्यों में प्रयुक्त सामग्री के खर्च में 25 प्रतिशत और प्रशासनिक में 50 प्रतिशत का योगदान कर रही हैं।
श्री चौहान ने कहा है कि इस योजना के तहत ग्रामीण अर्थव्यवस्था के चार प्रमुख क्षेत्रों- जल सुरक्षा, बुनियादी ग्रामीण अवसंरचना , आजीविका संबंधी अवसंरचना के विकास के कामों तथा अति वृष्टि या अनावृष्टि जैसी मौसम संबंधी आपादाओं के आजीविका पर प्रभाव को दूर करने के लिए विशेष कार्यों को संपादित किया जाएगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि संशोधित विधेयक में मनरेगा से बेहतर प्रावधान हैं और यह लागू होने के बाद ज्यादा बेहतर ढंग से ग्रामीण क्षेत्र में जनता की सेवा करेगा। उनका कहना था कि मनरेगा की कमियों को दूर किया गया है और रोजगार नियोजन, पारदर्शिता तथा जवाबदेही की व्यवस्थाओं को मजबूत किया गया है।
कृषि मंत्री ने कहा कि विधेयक में प्रावधान है कि यदि जरूत मंदों को 125 दिन का काम हर साल नहीं मिलता है तो राज्य सरकारों के लिए उन्हें बेरोजगारी भत्ता देना अनिवार्य होगा। मनरेगा में कई बड़े सुधार किये गये लेकिन यह वर्तमान जरूरतों पर खरा नहीं उतर रहा है इसलिए इसमें बड़ा संशोधन किया गया है और अब नयी व्यवस्था के अनुसार इसमें हेराफेरी नहीं हो सकेगा। इसी खामी के कारण 23 राज्यों में खर्च और काम में ताल मेल नहीं दिखता है।
श्री चौहान ने सदस्यों के उन आरोपों को खारिज कर दिया जिनमें कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अपनी मर्जी से योजनाओं के नाम बदलती है। नेहरू गांधी परिवार के सदस्यों के नाम पर कई कल्याणकारी कार्यक्रमों की सूची गिनाते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस का राजनीतिक फायदे के लिए नाम जोड़ने का लंबा इतिहास रहा है।
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