नयी दिल्ली , दिसम्बर 17 -- राज्यसभा में विपक्षी दलों ने बुधवार को बीमा संशोधन विधेयक के जरिये देश के बीमा क्षेत्र का नियंत्रण विदेशियों के हाथ में सौंपने का आरोप लगाया और इसे हड़बड़ी में पारित न करने की अपील करते हुए प्रवर समिति में भेजने की मांग की वहीं सत्तारूढ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने इसे बीमा की पहुंच देश के जन जन तक पहुंचाने के लिए क्रांतिकारी बताते हुए कहा कि इससे विकसित भारत का वह सपना पूरा होगा जब हर व्यक्ति के पास उसकी हर वस्तु का बीमा होगा।
कांग्रेस के शक्ति सिंह गोहिल ने 'सबका बीमा सबकी रक्षा (बीमा विधि संशोधन) विधेयक' पर चर्चा की शुरूआत करते हुए आरोप लगाया कि यह विधेयक बिना समुचित विचार विमर्श और जरूरी संशोधनों के हड़बड़ी में लाया गया है। इसके गहन अध्ययन की जरूरत है और इसके लिए विधेयक को प्रवर समिति में भेजा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भाजपा के वरिष्ठ नेताओं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, सुषमा स्वराज , अरूण जेटली और यशवंत सिन्हा ने बीमा क्षेत्र में सौ प्रतिशत विदेश निवेश का कड़ा विरोध किया था।
उन्होंने कहा कि यह कानून बनने से बीमा क्षेत्र का नियंत्रण विदेशी कंपनियों के हाथ में चला जायेगा। इससे एक तरह से हमारे देश का अर्थतंत्र विदेशियों के हाथ में चलाया जायेगा। इसके अमल में आने पर भारतीयों को विदेशी लोगों को अपना आधार और पैन कार्ड देना होगा।
कांग्रेस सदस्य ने विभिन्न बीमा योजनाओं में खामियों का उल्लेख करते हुए कहा कि इनसे उपभोक्ताओं का कल्याण नहीं हो रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की नीतियों के कारण इन कंपनियों की हालत अच्छी नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार को बीमा कंपनियों के मुनाफे की सीमा निश्चित कर देनी चाहिए और इससे अधिक मुनाफे को उपभोक्ताओं के बीच बांटा जाना चाहिए।
श्री गोहिल ने विधेयक के नाम को लेकर भी सवाल उठाया और कहा कि विधेयक का मसौदा तैयार करते समय उसकी भाषा के साथ खिलवाड नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विधेयक का नाम न अंग्रेजी में है और न ही हिन्दी में है। विधेयक का नाम उसकी भावना के अनुरूप और छोटा होना चाहिए।
भारतीय जनता पार्टी के अरूण सिंह ने कहा कि यह विधेयक बहुत सोच समझकर व्यापक विचार विमर्श के बाद देश की जरूरतों को देखते हुए लाया गया है। विधेयक को समावेशी दृष्टि का परिचायक बताते हुए उन्होंने कहा कि इससे देश के हर व्यक्ति तक बीमा की पहुंच होगी। उन्होंने कहा कि विदेशी कंपनियों के आने से प्रतिस्पर्धा बढेगी और लोगों को अनेक विकल्प मिलेंगे।
उन्होंने कहा कि इस विधेयक का उद्देश्य बीमा का दायरा बढाकर भारत के बीमा बाजार को दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बनाना है। उन्होंने सदस्यों की आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा कि विदेशी कंपनियों को संचालित करने वाले नियम और नियंत्रण भारत के ही हाथ में रहेंगे। इनके मुख्य कार्यकारी अधिकारी और प्रबंध निदेशक भारत के ही रहेंगे। उन्होंने कहा कि नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ जुर्माने की राशि एक करोड से बढाकर दस करोड कर दी गयी है। उन्होंने कहा कि देश के बीमा बाजार के विस्तार के लिए यह विधेयक क्रांतिकारी है और इससे 2047 तक हर व्यक्ति के पास हर वस्तु का बीमा होगा।
तृणमूल कांग्रेस के साकेत गोखले ने कहा कि बीमा आम आदमी के जीवन पर गंभीर प्रभाव डालता है। यह विधेयक बीमा धारक की परवाह नहीं करता बल्कि बीमा कंपनी की परवाह करता है। उन्होंने वित्त मंत्री पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया और कहा कि यह बीमा की अवधारणा के विपरीत है। उन्होंने कहा कि विदेशी कंपनियों के आने से भारतीय जीवन बीमा निगम जैसी सरकारी कंपनी प्रभावित होंगी।
उन्होंने बीमा कंपनियों के मुनाफे की निगरानी को लेकर भी सवाल उठाया और कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच के लिए इन कंपनियों की क्या प्रतिबद्धता होगी। उन्होंने पूछा कि प्रीमियम का नियमन कैसे किया जायेगा। उन्होंने भारतीय कंपनियों पर इसके प्रभाव के बारे में श्वेत पत्र लाए जाने की मांग की। उन्होंने विधेयक का विरोध करते हुए इसे स्थायी समिति को भेजा जाना चाहिए।
द्रमुक की कनिमोझी एनवीएन सोमू ने विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि इससे निजी क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित होगा। उन्होंने कहा कि यह विधेयक घरेलु बचत तंत्र के लिए खतरनाक साबित होगा। इसका मतलब विदेशी बीमा कंपनियों को सौ प्रतिशत आत्मसमर्पण होगा। उन्होंने कहा कि इससे देश में काला धन आने का अप्रत्यक्ष मार्ग खुल जायेगा। उन्होंने भी विधेयक को स्थायी समिति को भेजे जाने की मांग की।
वाईएसआरसीपी के अयोध्या रामी रेड्डी ने विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि इससे बीमा क्षेत्र में पूंजी बढेगी और बीमा का दायरा भी बढेगा। उन्होंने सख्त नियमों के साथ उपभोक्ताओं का संरक्षण करने की मांग की।
बीजू जनता दल के शुभाशीष खुंटिया ने विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि बीमा क्षेत्र देश के लोगों की बचत सुरक्षा से जुड़ा है। इस विधेयक का खतरनाक पहलु यह है कि इससे बीमा क्षेत्र का नियंत्रण विदेशी निवेशकों के हाथ में चला जायेगा। उन्होंने कहा कि इसे व्यापक विचार विमर्श के लिए स्थायी समिति में भेजा जाना चाहिए।
राष्ट्रीय जनता दल के संजय यादव ने कहा कि सौ प्रतिशत एफडीआई से बीमा क्षेत्र का नियंत्रण विदेशी कंपनियों के हाथ में चला जायेगा। ये कंपनी अपने हितों की रक्षा करेंगी और उन्हें उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा से कुछ नहीं लेना देना। उन्होंने भी विधेयक को स्थायी समिति में भेजने की मांग की।
अन्नाद्रमुक के एम तंबी दुरै ने विधेयक का समर्थन किया लेकिन इसके नाम को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि इसके माध्यम से हिन्दी को थोपने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं में भी विधेयकों के नाम रखे जाने चाहिए।
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