पुणे 14 फरवरी (वार्ता) चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने शनिवार को पाकिस्तान पर कटाक्ष करते हुए कहा कि विजय की घोषणा केवल बयानबाजी से नहीं की जाती, बल्कि इसे साक्ष्यों के माध्यम से सिद्ध किया जाता है, जैसा कि भारत ने 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान किया था।
दक्षिणी कमान पर आयोजित 'जय से विजय' सेमिनार 2026 में बोलते हुए सीडीएस जनरल चौहान ने कहा कि रक्षा बलों के संदर्भ में, विजय की भावना ध्वस्त आतंकी बुनियादी ढांचे, क्षतिग्रस्त रनवे, पंगु हवाई क्षेत्रों और निष्क्रिय वायु रक्षा प्रणालियों के आधार पर निर्मित नहीं की जा सकती। इस प्रकार की जीतें या नारे टिकते नहीं हैं। वास्तविक विजय प्रदर्शित साक्ष्यों और सत्यापन योग्य परिणामों में निहित होती है।
सीडीएस ने कहा कि 'जय' शब्द औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति का भी प्रतिनिधित्व करता है, जो मौलिक सोच और भारतीय विचार प्रक्रिया को पुनर्जीवित करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। अगले दशक के लिए भारत की रक्षा मुद्रा को भविष्य की चुनौतियों के संतुलित आकलन द्वारा आकार देने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि आज विश्व वैश्विक भू-राजनीति के सबसे नाटकीय दौर से गुजर रहा है। यह अत्यधिक अनिश्चितता और निरंतर परिवर्तन का क्षण है। इसमें पहला बिंदु दमनकारी राष्ट्रवाद का उदय और आर्थिक हथियारीकरण है। व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला, प्रौद्योगिकी तक पहुंच, डेटा और महत्वपूर्ण संसाधनों का उपयोग राष्ट्रों द्वारा रणनीतिक लाभ के उपकरण के रूप में किया जा रहा है।
दूसरा, वैश्वीकरण या सर्वसम्मति के उन आदर्शवादी विचारों से स्पष्ट रूप से पीछे हटने की स्थिति दिख रही है, जो पहले सुने जाते थे। प्रवासन का दबाव, जनसांख्यिकीय असंतुलन, सामाजिक ध्रुवीकरण, बेरोजगारी और असमानता समाज को, विशेष रूप से उदार लोकतंत्रों को, जबरदस्त तनाव में डाल रहे हैं। तीसरा, यह युग त्वरित तकनीकी उन्नति या तकनीकी व्यवधान द्वारा परिभाषित है।
यह बताते हुए कि प्रौद्योगिकी शक्ति का एक निर्णायक निर्धारक बन गई है, जनरल चौहान ने कहा कि क्वांटम कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स, मशीन लर्निंग और लंबी दूरी की सटीकता में प्रगति न केवल प्रतिरोध को, बल्कि युद्ध और उसके विस्तार को भी आकार दे रही है।
उन्होंने कहा कि स्थापित मानदंडों और अच्छे राजकीय व्यवहार की अपेक्षाओं के स्पष्ट क्षरण के बारे में भी बात की। उन्होंने कहा कि संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता जैसी अवधारणाएं, जिन्हें हम स्थिर मानते थे, आज तेजी से सवालों के घेरे में हैं। परिणामस्वरूप, राष्ट्र-राज्यों को परिभाषित करने वाली भौगोलिक सीमाएं, जिन्हें हम अपरिवर्तनीय मानते थे, आज संदेहास्पद होती जा रही हैं।
तेजी से बदलते वैश्विक सुरक्षा वातावरण की एक गंभीर तस्वीर पेश करते हुए, सीडीएस ने चेतावनी दी कि पारंपरिक नियम-आधारित व्यवस्था का पतन हो रहा है क्योंकि "शक्ति ही अधिकार" बनती जा रही है और बल प्रयोग की सीमा घट रही है। उन्होंने कहा कि सटीक हथियारों और लंबी दूरी के लक्ष्यीकरण में प्रगति ने अतिरिक्त क्षति को कम कर दिया है, जिससे उस नैतिक और राजनीतिक संकोच में कमी आई है जो कभी राष्ट्रों को बल प्रयोग करने से रोकता था।
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