ऋषिकेश , जनवरी 23 -- उत्तराखंड में ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन में शक्रवार को वसन्त पंचमी का पावन पर्व अत्यन्त श्रद्धा, भक्ति और दिव्यता के साथ मनाया गया और विद्या, बुद्धि, वाणी और विवेक की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की विधिवत पूजा-अर्चना की गयी तथा विशेष यज्ञ के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व में शान्ति, सद्भाव और कल्याण की प्रार्थना की गई।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि वसन्त पंचमी, जीवन में नये उल्लास, नयी चेतना और सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक है। माँ सरस्वती श्वेत वस्त्र, श्वेत कमल और वीणा धारण करती हैं, ये सभी पवित्रता, शान्ति और संतुलन के प्रतीक हैं। आज के अशांत और तनावग्रस्त युग में माँ सरस्वती का यह संदेश अत्यन्त प्रासंगिक है कि ज्ञान केवल पुस्तकों तक सीमित न हो, बल्कि वह जीवन को सुन्दर, सरल और संवेदनशील बनाने का माध्यम बने।

आज ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती, पराक्रम दिवस पर परमार्थ निकेतन से उनकी साधना और राष्ट्रभक्ति को नमन किया गया। नेताजी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे महानायक थे जिनका जीवन अदम्य साहस, अपराजेय आत्मबल और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने पराधीनता की जंजीरों को तोड़ने के लिए निर्भीक नेतृत्व प्रदान किया और "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा" जैसे उद्घोष से सम्पूर्ण राष्ट्र में क्रांति की चेतना जागृत की। ऐसे महापुरूष की साधना को नमन।

नेताजी का पराक्रम केवल रणभूमि तक सीमित नहीं था, बल्कि उनके विचार, त्याग और राष्ट्र के लिए सर्वस्व अर्पण करने की भावना में भी प्रकट होता है। आज भी उनका जीवन हमें साहस, बलिदान, अनुशासन और राष्ट्रीय एकता के आदर्शों पर चलने की प्रेरणा देता है। पराक्रम दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि सशक्त, आत्मनिर्भर और एकजुट भारत के निर्माण में नेताजी का संदेश सदैव मार्गदर्शक रहेगा।

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