नैनीताल , मार्च 10 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कार्य-प्रभारित (वर्क-चार्ज) कर्मचारियों के पेंशन रोके जाने सम्बन्धी 16 जनवरी के कार्यालय आदेश पर रोक जारी रखते हुए सरकार को नोटिस जारी किया है।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने 16 जनवरी 2026 को राज्य सरकार द्वारा जारी उस कार्यालय ज्ञाप के प्रभाव और संचालन पर रोक जारी रखी है जो इन कर्मचारियों की पेंशन गणना में बाधा बन रहा था।
बच्चन सिंह पवार व अन्य की याचिका की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकीलों ने 'उत्तराखंड पेंशन हेतु अर्हकारी सेवा और विधिमान्यकरण अधिनियम, 2022' की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी। दलील दी गई कि यह अधिनियम उन वर्क-चार्ज कर्मचारियों को पेंशन लाभ से वंचित करने की कोशिश करता है, जिन्होंने अपनी सेवाओं का एक लंबा हिस्सा विभाग को दिया है। याचिका में कहा गया कि यह कानून शीर्ष अदालत के पूर्व के आदेशों की मूल भावना के विपरीत है।
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के 'प्रेम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले का विशेष उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि तीन जजों की बेंच ने स्पष्ट किया था कि वर्क-चार्ज कर्मचारियों की पूरी सेवा अवधि को पेंशन के लिए गिना जाना चाहिए। कोर्ट ने भी माना कि इस मामले में गहन विचार की आवश्यकता है, क्योंकि वर्तमान कानून की व्याख्या में कुछ अस्पष्टता नजर आ रही है।
यह भी दलील दी गई कि वर्ष 2022 का यह अधिनियम वास्तव में विधायिका द्वारा न्यायपालिका के फैसलों को पीछे से बदलने की एक कोशिश है। उत्तर प्रदेश में भी इसी तरह के प्रावधानों को इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने 'जय राम शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले में खारिज या संशोधित कर दिया था। इसी आधार पर उत्तराखंड के कानून को भी चुनौती दी गई है।
इस मामले में एक अधिनियम की 'विधिक वैधता' को चुनौती दी गई है, इसलिए उच्च न्यायालय ने प्रदेश के प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। कोर्ट ने सभी प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। अब सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि वर्क-चार्ज सेवाओं को पेंशन के दायरे से बाहर रखना किस प्रकार संवैधानिक है।
मामले की अगली सुनवाई मार्च के तीसरे सप्ताह में होगी। इस मामले को समान प्रकृति वाली अन्य याचिकाओं के साथ सूचीबद्ध किया गया है। माना जा रहा है कि उच्च न्यायालय इस गंभीर मुद्दे पर एक व्यापक फैसला जारी कर सकता है।
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