नयी दिल्ली, 08 दिसंबर (वार्ता) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस पर वंदे मातरम के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि तुष्टीकरण की राजनीति के दबाव में कांग्रेस वंदे मातरम के बंटवारे के लिए झुकी और मुस्लिम लीग के सामने घुटने टेक दिये।
श्री मोदी ने राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होने पर लोकसभा में सोमवार को चर्चा की शुरूआत करते हुए कहा कि वंदे मातरम के प्रति मुस्लिम लीग की विरोध की राजनीति तेज होती जा रही थी। मोहम्मद अली जिन्ना ने पंद्रह अक्टूबर 1937 को लखनऊ में वंदेमातरम के विरोध का नारा बुलंद किया तब कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू को अपना सिंहासन डोलता दिखा। जवाहर लाल नेहरू ने ऐसे समय मुस्लिम लीग को जवाब देने और कांग्रेस की वंदे मातरम में निष्ठा को प्रकट करने के बजाय वंदे मातरम की ही पड़ताल शुरु कर दी। उन्होंने कहा कि विरोध के पांच दिन बाद बीस अक्टूबर को जवाहर लाल नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस को चिट्ठी लिखी और इसमें उन्होंने जिन्ना की भावना से अपनी सहमति जतायी जिसमें कहा गया कि यह गीत मुस्लमानों की भावनाओं को ठेस पहंचा सकता है। उन्होंने कहा कि सुभाष चन्द्र बाेस को जो पत्र लिखा गया उसमें जवाहर लाल नेहरू ने कहा कि मैंने वंदे मातरम का बैकग्राउंड पढा है और मुझे लगता है इससे मुस्लिम भड़केंगे। इसके बाद कांग्रेस की तरफ से बयान आया कि 26 अक्टूबर से कांग्रेस की कार्यसमिति की बैठक में वंदेमातरम की समीक्षा होगी। इससे पूरा देश हैरान था। पूरे देश में इसके विरोध में प्रभात फेरियां निकाली। दुर्भाग्य है कि कांग्रेस ने वंदेमातरम पर समझौता कर लिया। वंदे मातरम के टुकड़े कर दिये।। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के सामने घुटने टेक दिये।
प्रधानमंत्री ने कहा कि तुष्टीकरण की राजनीति के दबाव में कांग्रेस वंदे मातरम के बंटवारे के लिए झुकी ,इसलिए कांग्रेस को एक दिन भारत के बंटवारे के लिए झुकना पड़ा। प्रधानमंत्री ने कहा कि दुर्भाग्य से कांग्रेस की नीतियां आज भी वैसे ही है। आज भी कांग्रेस और उनके सहयोगी वंदेमातरम पर विवाद खड़ा करने की कोशिश करते हैं।
श्री मोदी ने कहा " वंदेमातरम पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की भावना क्या थी वह भी सदन के समक्ष रखना चाहता हूं। उस समय दक्षिण अफ्रीका से इंडियन ओपिनियन नाम की एक पत्रिका निकलती थी जिसमें दो दिसंबर 1905 में महात्मा गांधी ने लिखा था यह गीत वंदेमातरम जिसे बंकिम चंद्र ने रचा है, पूरे बंगाल में अत्यंत लोकप्रिय हो गया है। स्वदेशी आदोलन के पक्ष में विशाल सभायें हुई जहां लाखों लोगों ने ये गीत गाया। उन्होंने लिखा कि यह गीत इतना लोकप्रिय हो गया जैसे ये हमारा राष्ट्रीय गान बन गया है। यह अन्य राष्ट्रों की गीतों से मधुर है। यह भारत को मां के रूप में देखता है और उसकी स्तुति करता है। उन्होंने कहा कि जो वंदे मातरम् महात्मा गांधी को राष्ट्रीय गान के रूप में दिखता था। यह गीत इतना महान था तो पिछली सदी में इसके साथ इतना बड़ा अन्याय क्यों हुआ। इसके साथ विश्वासघात क्यों हुआ। कौन सी ताकत थी जिसकी इच्छा पूज्य बापू पर भी भारी पड़ गयी और वंदे मातरम को विवादों में घसीट दिया। हमें उन परिस्थितियों को नई पीढी को बताना जरूर है आखिर क्यों वंदे मातरम के साथ विश्वासघात किया गया।"उन्होंने कहा कि वंदेमातरम ने देश को हिम्मत दी थी। बंगाल की गलियों से निकली आवाज देश की आवाज बन गयी थी। उन्होंने कहा कि हमारे जांबाजों सपूत बिना किसी डर के फांसी के तख्ते पर चढते थे और आखिरी समय में वंदेमातरम का उदघोष करते थे। उन्होंने कहा कि अनगिनत वीर सपूतों ने जुल्म सहा लेकिन एक ही नारा था एक भारत श्रेष्ठ भारत। उन्होंने कहा कि मास्टर सूर्यसेन को जब फांसी दी गयी तब उन्होेंने अपने साथियों को एक पत्र लिखा था जिसमें एक ही गूंज थी वंदे मातरम।
प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया में कोई एक ऐसा भाव गीत नहीं हो सकता है जो सदियों तक प्रेरित करता हो लेकिन वंदेमातरम आज भी हमें प्रेरित कर रहा है। इसमें हमारी स्वतंत्रता, बलिदान, उर्जा, समर्पण और त्याग का मंत्र था। इस गीत की लोकप्रियता ने उसी कालखंड में वंदे मातरम की रिकार्डिंग दुनिया में पहुंचा दिया। उस समय लंदन के इंडिया हाउस में वीर सावरकर ने यह गीत गाया। उसी समय विपिन चंद्र पाल ने अखबार निकला जिसका नाम भी वंदेमातरम रखा। डगर डगर पर अंग्रेजों का नींद हराम करने के लिए वंदेमातरम काफी था। मैडम भीकाजी कामा ने भी वंदेमातरम अखबार निकाला। वंदेमातरम ने भारत को स्वाबलंबन का रास्ता दिखाया। उस समय माचिस की डिबिया से लेकर जहाज पर वंदेमातरम लिखा जाता था। यह स्वदेशी का मंत्र बन गया था।
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