, Dec. 17 -- खुफिया पुलिस यह समझ गयी कि यह काम साधारण डाकुओं का नहीं हो सकता क्योंकि वह तो प्रायः असहाय यात्रियों का ही धन लूटते हैं। इस घटना के दूसरे दिन 10 अगस्त को समाचार पत्रो में इस भीषण ट्रेन डकैती का जब रोमांचकारी विवरण छपा तभी से पुलिस की निगाह में क्रांतिकारी चढ गये और शाहजहांपुर में मुखबिरी होने लगी। विशेष दस्ते के प्रभारी हार्ट्रन नियुक्त हुए।
10 अगस्त को खुफिया विभाग वालों ने बिस्मिल का पता लगाया तो यह मालुम हुआ कि वह बाहर हैं। गिरफ्तारियां शुरू हुयी ओर 26 सितंबर नौ दुर्गा के दिन सुबह दातवन करते समय बिस्मिल गिरफ्तार कर लिये गये।
काकोरी षडयंत्र में कुल 36 लोग गिरफ्तार हुए। 28 नवजवानों पर मजिस्ट्रेट के यहां चार्जसीट आयी। दो पर से मुकदमा हटा दिया गया। सरकारी गवाह बनाकर मांफी दी गयी। 24 को मजिस्ट्रेट एनेउददीन ने सेशन सुपुर्द किया।
छह अप्रैल 1927 को सत्र न्यायरधीश मिस्टर हैमिल्टन ने अपने 115 पेज के फैसले में पंडित बिस्मिल को निर्दयी और हत्यारा सम्बोधित कर यह लिखा कि राम प्रसाद बिस्मिल को तब तक फांसी पर लटकाया जाय जब तक प्राण न निकल जाय। बिस्मिल ने 18 जुलाई 1927 को अवध चीफ कोर्ट में सजा कम करने और पुनः विचारार्थ याचिका दाखिल की गयी मगर चीफकोर्ट के जजों ने याचिका अस्वीकार कर दी।
बिस्मिल ने फांसी से तीन दिन पूर्व यानी 16 दिसम्बर 1927 में गोरखपुर जिला जेल जो आत्म कथा लिखी है,उसमें अपने कार्यों का जिक्र किया है। बिस्मिल जी जिला जेल की कोठरी नंबर आठ में रहते हुए लिखते हैं " मुझे इस कोठरी में बडा आनन्द आ रहा है। वे वहां से लिखे अपने मां को एक पत्र में कहा कि तुम्हे मेरी मौत की दर्दनाक खबर सुनायी जायेगी। मां मुझे यकीन है कि तुमसहन कर लोगी क्योंकि तुम्हारा बेटा माताओं की माता भारत माता की सेवा में जिन्दगी को कुर्बान कर रहा है। उसने तुम्हारे परिवार पर कोई आंच नहीं आने दी बल्कि उसका रूतबा बुलन्द किया।
19 दिसमबर 1927 को प्रातः दैनिक क्रिया क्लाप, स्नान आदि से निवृत होकर प्रातः काल साढे छह बजे बन्देमातरम और भारत माता की जय बोलते हुए पं.0 राम प्रसाद बिसिमल फांसी पर झूल गये। फांसी पर झूलते समय ओंम का ऐसा उच्चारण उन्होने किया जो काफी देर तक आकाश में गूंजता रहा।
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