वाराणसी , अप्रैल 15 -- ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को पत्र लिखकर अयोध्या में राम जन्मभूमि के मूल स्थान की शास्त्रीय स्थिति और वहाँ स्थापित की गई पीतल की 'ज्योतिस्वरूप' कलाकृति पर गंभीर आपत्ति दर्ज की है।

शंकराचार्य के मीडिया प्रभारी संजय पांडेय ने बुधवार को बताया कि शंकराचार्य जी ने इसे शास्त्रीय मर्यादाओं का उल्लंघन तथा सनातन परंपराओं के साथ 'अक्षम्य भूल' करार दिया है।

श्री पांडेय ने बताया कि महाराज श्री ने स्पष्ट किया है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की जन्मभूमि का प्रत्येक कण वंदनीय है। विशेष रूप से वह स्थान, जहाँ पूर्व में केंद्रीय गुंबद था और जहाँ वर्षों तक प्रभु का 'चल विग्रह' प्रतिष्ठित रहा, अपनी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण अत्यंत संवेदनशील है।

महाराज श्री ने ट्रस्ट से प्रश्न किया है कि क्या वर्तमान भव्य मंदिर का गर्भगृह उस 'मूल जन्म स्थान' से अलग बनाया गया है? उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ऐसा है, तो यह शास्त्र और परंपरा की दृष्टि से एक गंभीर भूल होगी, क्योंकि गर्भगृह का स्थान अपरिवर्तनीय माना जाता है।

ट्रस्ट द्वारा उक्त पावन स्थान पर स्थापित की गई पीतल की 'ज्योतिस्वरूप' कलाकृति पर आपत्ति जताते हुए शंकराचार्य जी ने कहा, "अग्निमुखं वै देवाः"। ज्योति का अर्थ साक्षात् 'तेज' तत्व (अग्नि) है। पीतल को ज्वाला का आकार दे देने मात्र से वह ज्योति नहीं बन जाती। बिना घी, तेल और वर्तिका के किसी भी जड़ पदार्थ को 'ज्योति' की संज्ञा देना शब्द-भ्रम उत्पन्न करना और शास्त्रीय मर्यादा का अपमान है। जो आकृति स्वयं के प्रकाश के लिए बाहरी विद्युत (बिजली) पर निर्भर हो, उसे 'अखंड ज्योति' कहना सनातन धर्म की परिभाषाओं के विरुद्ध है।

शंकराचार्य जी ने पत्र लिखकर ट्रस्ट से मांग की है कि वर्तमान मुख्य गर्भगृह और 'ज्योतिस्वरूप' वाले स्थान के बीच के शास्त्रीय संबंध को तत्काल स्पष्ट किया जाए। साथ ही उक्त अशास्त्रीय धातु-कलाकृति को वहाँ से हटाकर उसके स्थान पर विधि-विधान से साक्षात् ज्योति (घी या तेल का दीपक) की स्थापना की जाए।

शंकराचार्य जी ने कड़े शब्दों में कहा है कि राम मंदिर जैसे धर्म-प्राण केंद्र पर परंपराओं का आधुनिकीकरण और शास्त्रों की उपेक्षा भविष्य के लिए घातक सिद्ध होगी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट अपनी इस भूल को सुधारते हुए यथाशीघ्र शास्त्रीय मर्यादा की पुनर्स्थापना करेगा और मूल स्थान को लेकर भक्तों के बीच उत्पन्न हो रही भ्रांति का निवारण करेगा।

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