पटना , फरवरी 12 -- बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने गुरुवार को कहा कि राज्य सरकार पूरे बिहार में भूमि से जुड़े विवादों के समाधान के लिए प्रतिबद्ध है और सुनिश्चित करना चाहती है कि आने वाली पीढ़ियों को ऐसे विवाद विरासत में नही मिलें।
श्री सिन्हा ने राज्य विधानसभा में आज जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के विधायक मंजीत कुमार सिंह के एक अल्पसूचित प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि सरकार पूरी संवेदनशीलता के साथ बिहार को भूमि विवादों से मुक्त करने के लिए काम कर रही है और इन प्रयासों का प्रभाव अब दिखने भी लगा है। उन्होंने इसे सामूहिक जिम्मेदारी बताते हुए कहा कि सरकार स्थायी समाधान सुनिश्चित करने के लिए संकल्पित है।
उपमुख्यमंत्री ने कहा कि दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) के मामलों में व्यावहारिक कठिनाइयाँ तब आती हैं, जब भूमि दस्तावेजों में खाता और खेसरा संख्या जैसे विवरण दर्ज नहीं होते। उन्होंने कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए 29 अक्टूबर 2024 और 4 मार्च 2025 को सभी बंदोबस्त अधिकारियों को निर्देश जारी किए गए कि वे बिहार विशेष सर्वेक्षण एवं बंदोबस्त कार्यक्रम के तहत राजस्व गांवों में असर्वेक्षित भूमि की श्रेणियों का विशेष सर्वेक्षण कराएं। इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद सभी अंचलों के असर्वेक्षित गांवों में भी विशेष सर्वेक्षण एवं बंदोबस्त का कार्य पूरा किया जाएगा। उन्होंने कहा कि असर्वेक्षित भूमि के स्वामित्व और अधिकार से संबंधित कार्रवाई महाधिवक्ता की सलाह के हिसाब से जार रही है।
विधायक श्री सिंह ने पूरक प्रश्न के माध्यम से कहा कि बिहार में लगभग 18.4 लाख हेक्टेयर भूमि असर्वेक्षित है, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 20 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि विशेष सर्वेक्षण और बंदोबस्त की प्रक्रिया जारी है और इसमें तीन वर्ष से अधिक समय लग सकता है, इसलिए सरकार को एक स्पष्ट समय-सीमा तय करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सर्वेक्षण के अभाव में कई विवाद उत्पन्न हुए हैं और किसानों को फसल क्षति तथा भूमि अभिलेखों से जुड़ी कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
मंत्री श्री सिन्हा ने विधायक श्री सिंह के सवाल का जवाब देते हुए कहा कि सर्वेक्षण कार्य वर्ष 2012 में शुरू हुआ था, 2015 में इसकी समीक्षा की गई और 2019 में इसमें कई बदलाव किए गए। सरकार ने अब सर्वेक्षण को दो वर्षों के भीतर पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। उन्होंने स्वीकार किया कि सर्वेक्षण के अभाव में कई छोटे और सीमांत किसान सरकारी अनुदानों से वंचित हैं और भूमि की खरीद-बिक्री में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।
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