चेन्नई , जनवरी 20 -- तमिलनाडु के राज्यपाल आर. एन. रवि द्वारा विधानसभा में अपना परंपरागत नववर्ष संबोधन दिए बिना सदन से वॉकआउट करने के कुछ ही मिनट बाद मुख्यमंत्री और द्रमुक अध्यक्ष एम. के. स्टालिन ने बड़ी राजनीतिक घोषणा की । उन्होंने कहा कि द्रमुक देशभर की समान विचारधारा वाली पार्टियों के साथ मिलकर संसद में आवश्यक संवैधानिक संशोधन लाने के लिए कदम उठाएगी, ताकि विधानसभा में राज्यपाल के नववर्ष संबोधन की परंपरा को समाप्त किया जा सके।
सदन द्वारा उनके प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित करने के बाद मुख्यमंत्री ने कहा कि यह पूरी तरह अनुचित है कि हर साल राज्य सरकार संबोधन तैयार करे, उसे राजभवन भेजे और राज्यपाल उसे पढ़ने से इनकार कर दें। उन्होंने कहा कि यह रवैया न केवल तमिलनाडु में, बल्कि अन्य राज्यों में भी देखा जा रहा है, जहां राज्यपाल निर्वाचित सरकारों के कामकाज में बाधा बन रहे हैं। श्री स्टालिन ने कहा कि इसे केवल एक दिन की खबर के रूप में नहीं छोड़ा जा सकता। विधानसभा की परंपरा और मर्यादा के अनुसार राज्यपाल को वही संबोधन पढ़ना चाहिए, जो राज्य सरकार द्वारा तैयार किया गया हो।
उन्होंने सवाल उठाया, "यदि कोई व्यक्ति (राज्यपाल) लगातार इस परंपरा का उल्लंघन करता है, तो स्वाभाविक है कि लोगों के मन में यह सवाल उठे कि ऐसी व्यवस्था को बनाए रखने की जरूरत ही क्या है।" मुख्यमंत्री ने सदन को आश्वासन दिया कि द्रमुक देश की सभी समान विचारधारा वाली पार्टियों से परामर्श कर, संसद में आवश्यक संवैधानिक संशोधन लाने के लिए प्रयास करेगी, ताकि नए साल की शुरुआत में राज्यपाल के संबोधन की परंपरा को समाप्त किया जा सके। इस घोषणा का सत्तारूढ़ दल के सदस्यों ने मेजें थपथपाकर जोरदार समर्थन किया। इससे पहले प्रस्ताव पेश करते हुए श्री स्टालिन ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा तैयार संबोधन को पढ़े बिना राज्यपाल का विधानसभा से बाहर जाना सदन के लिए अस्वीकार्य है।
उन्होंने कहा कि सदन का यह मानना है कि सभी सदस्यों को वितरित अंग्रेज़ी संस्करण को पढ़ा हुआ माना जाए और उसे विधानसभा के अभिलेखों में शामिल किया जाए। इसके साथ ही तमिल संस्करण, जिसे विधानसभा अध्यक्ष एम. अप्पावु ने पढ़ा, और मुख्यमंत्री द्वारा पेश प्रस्ताव की सामग्री भी रिकॉर्ड में दर्ज की जाए। श्री स्टालिन ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 176 और विधानसभा की परंपराओं के अनुसार राज्यपाल को सरकार द्वारा तैयार पूरा संबोधन सदन में पढ़ना अनिवार्य है। संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो राज्यपाल को अपने व्यक्तिगत विचार थोपने या संबोधन में बदलाव, कटौती या विचलन की अनुमति देता हो।
राज्यपाल की कार्रवाई को 100 साल पुरानी विधानसभा परंपराओं और जनता की आवाज़ का अपमान बताते हुए मुख्यमंत्री ने 10 अप्रैल 2023 को सदन में दिए अपने भाषण को याद किया, जिसमें उन्होंने द्रमुक संस्थापक अन्नादुरई के शब्दों का उल्लेख किया था, "बकरे के लिए दाढ़ी ज़रूरी नहीं और देश के लिए राज्यपाल का पद भी अनिवार्य नहीं।"उन्होंने कहा कि इसके बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री और द्रमुक नेता एम. करुणानिधि ने हमेशा राज्यपाल के पद को सम्मान दिया और उनकी सरकार भी उसी परंपरा का पालन कर रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इसी भावना के तहत इस वर्ष भी राज्यपाल का संबोधन तैयार किया गया था, लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्यपाल ने एक बार फिर सदन में संबोधन पढ़े बर्हिगमन का रास्ता चुना, जो राज्य के आठ करोड़ से अधिक लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाता है।
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