बारां , दिसम्बर 15 -- राजस्थान में अखिल भारतीय साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था 'विकल्प जनवादी सांस्कृतिक, साहित्यक मंच' इकाई की स्थापना के अवसर पर नसियां जैन मंदिर परिसर में रविवार रात को आयोजित 'सृजन सरोकार काव्य गोष्ठी ' में आम जन की पीड़ा के साथ परिवर्तन के नए स्वर उभरे।
गोष्ठी में बारां एवं निकटवर्ती अंचलों किशनगंज, भंवरगढ़, छीपाबडौद, छबड़ा, अंता मांगरोल के प्रतिनिधि, कवि, शायरों के साथ साथ कोटा से 'विकल्प 'से जुड़े साहित्यकारों की उपस्थिति ने अपनी कविताओं से गोष्ठी को यादगार बना दिया।
'विकल्प' के महासचिव साहित्यकार महेन्द्र नेह ने कहा कि वर्तमान दौर में साहित्य का बड़ा हिस्सा मानवीय मूल्यों और सामाजिक सरोकारों से विच्छिन्न होकर भाग्यवाद, सस्ते मनोरंजन और व्यक्तिवाद की सीमाओं में सिकुड़ गया है। उन्होंने कहा कि साहित्य और संस्कृति का काम अपनी रचनाओं में आम आदमी की पीड़ा को स्वर देकर सोये हुए समाज में जागरण की लहर पैदा करना है।
श्री नेह ने कबीर, प्रेमचंद, निराला, साहिर और फैज़ की कविताओं से प्रेरणा लेकर सृजन के नए द्वार खोलने का अनुरोध किया। विशिष्ट अतिथि एडवोकेट दिनेशराय द्विवेदी ने कहा कि वर्तमान समाज में पूँजी के प्रभुत्व ने मनुष्य को स्वार्थी और संवेदनहीन बना दिया है, अतः साहित्य के केंद्र में मनुष्य की प्रतिष्ठा होनी चाहिए।
इससे पहले गोष्ठी का प्रारंभ सुप्रसिद्ध जन कवि चम्पालाल राव हाड़ौत्या द्वारा अपने हाड़ोती के गीतों में कृषकों, मजदूरों की पीड़ा और आक्रोश को स्वर देने के साथ हुआ। विष्णु प्रसाद तिवारी ने मनरेगा पर व्यंग्य करती अपनी कविता में कहा- "डुबा रहे निर्धन की नैया, कोई खाए न खाए, तू तो खा" सुनाई।
युवा कवि पीयूष परिंदा ने अपनी प्रस्तुति में कहा " बारिशों, आंधियो आओ, मैं तुम्हें मना लूंगा, मैं परिंदा हूँ, नया घोंसला बना लूंगा। रामकरण प्रभाती ने बेरोजगारी, जगदीश निराला ने "बाढ़ खेत नैं खारी छै, अब कईं करां" कोटा के कवि रंगकर्मी नारायण शर्मा ने "हम हैं तो समाज है। देश है, आओ मिल कर जीवन सुन्दर बनाएं" रचना सुनाई।
शायर मयंक सोलंकी ने अपनी ग़ज़लों से गोष्ठी को झकझोरा वहीं अतिथि ओम मेहता ने अपनी कविता 'वक्त आवाज़ देता है' में कहा 'उठेगा फिर से ज़माना गीत परचम के गाएगा, शहीदों की चिताओं से नया सन्देश लाएगा' सुनाकर दाद पाई।
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