रांची , मार्च 20 -- झारखंड की राजधानी रांची स्थित रांची विश्वविद्यालय के दीक्षांत मंडप परिसर में सरहुल पर्व की पूर्व संध्या पर आयोजित भव्य सांस्कृतिक समारोह ने पूरे शहर को पारंपरिक रंगों में सराबोर कर दिया।

सरना नवयुवक संघ की केंद्रीय समिति के तत्वावधान में हुए इस आयोजन ने झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और परंपराओं की जीवंत झलक पेश की।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों की उपस्थिति रही, जहां पारंपरिक वेशभूषा, लोकसंगीत और नृत्य ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। समारोह की खास बात यह रही कि इसमें झारखंड की विभिन्न जनजातीय भाषाओं और संस्कृतियों का संगम देखने को मिला। कुड़ुख, हो, मुंडारी, संथाली और नागपुरी भाषाओं के लोकनृत्यों की प्रस्तुति ने दर्शकों को खूब आकर्षित किया।

कलाकारों ने पारंपरिक वाद्ययंत्रों की मधुर धुन पर जैसे ही मंच संभाला, पूरा परिसर उत्साह और उमंग से भर उठा। हर प्रस्तुति में प्रकृति, परंपरा और सामुदायिक जीवन की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई दी, जो सरहुल पर्व के मूल भाव को जीवंत कर रही थी।

छात्र-छात्राओं ने भी कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उनके द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रमों और नृत्यों ने दर्शकों का दिल जीत लिया। रंग-बिरंगे परिधानों में सजे कलाकारों की ऊर्जा और तालमेल ने आयोजन को और भी आकर्षक बना दिया। हर प्रस्तुति पर दर्शकों ने तालियों की गूंज से कलाकारों का उत्साह बढ़ाया।

आयोजकों ने बताया कि सरहुल झारखंड का प्रमुख आदिवासी पर्व है, जो प्रकृति और सरना धर्म की आस्था से जुड़ा हुआ है। इस अवसर पर विशेष रूप से साखू (साल) वृक्ष की पूजा की जाती है और अच्छे मौसम, समृद्धि व खुशहाली की कामना की जाती है। इसी उद्देश्य से हर वर्ष सरहुल से पहले ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, ताकि नई पीढ़ी अपनी परंपराओं से जुड़ सके।

कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने कहा कि इस तरह के आयोजन न केवल मनोरंजन का माध्यम हैं, बल्कि अपनी जड़ों और संस्कृति को समझने का भी महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं। खासकर युवाओं में पारंपरिक विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाने में इनकी अहम भूमिका है।

शनिवार को पूरे झारखंड में सरहुल महोत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा, जिसे लेकर राज्यभर में तैयारियां जोरों पर हैं। पूर्व संध्या के इस आयोजन ने पहले ही त्योहार का माहौल बना दिया है।

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