नयी दिल्ली , फरवरी 03 -- उच्चतम न्यायालय ने व्हाट्सऐप और उसकी मूल कंपनी मेटा पर लक्षित विज्ञापन के लिए यूज़र डेटा साझा करने को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के कारोबारी हितों के लिए भारतीय नागरिकों के निजता के अधिकार से कोई समझौता नहीं किया जा सकता है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने मंगलवार को अंतरिम आदेश पारित करते हुए कहा कि वह भारतीय उपयोगकर्ताओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले किसी भी डेटा साझा करने की अनुमति नहीं देगी। न्यायालय ने साफ शब्दों में कहा कि भारत में काम कर रहे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिये संविधान का पालन अनिवार्य और गैर-परक्राम्य है।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, "हम डेटा साझा करने की अनुमति नहीं देंगे। हम भारतीय नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होने देंगे। अगर आप हमारे संविधान का पालन नहीं कर सकते, तो भारत छोड़ दीजिए।" पीठ ने व्हाट्सऐप की निजता नीति की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि यह नीति जानबूझकर इस तरह बनाई गई प्रतीत होती है, जिससे विशेषकर समाज के कमजोर वर्गों को भ्रमित किया जा सके।
न्यायालय ने कहा कि एक बुजुर्ग महिला, सड़क किनारे सामान बेचने वाला व्यक्ति, केवल तमिल जैसी किसी क्षेत्रीय भाषा को समझने वाला नागरिक या ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति से इस तरह की जटिल शर्तों के निहितार्थ को समझने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सूचित सहमति के महत्व पर जोर देते हुए न्यायालय ने कहा कि नागरिकों के निजता अधिकारों में किसी भी प्रकार की कटौती अस्वीकार्य है।
पीठ ने व्हाट्सऐप की डेटा साझा करने की प्रक्रिया की तुलना "चोरी करने के एक सभ्य तरीके" से करते हुए मामले की गंभीरता का उल्लेख किया।
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